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सबसे आगे लड़कियां

पहली बार ऐसा हुआ है कि केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा में पहले दोनों स्थान लड़कियों को मिले हैं। चेन्नई की विधि स्नातक एस दिव्यदर्शिनी पहले स्थान पर आई हैं और हैदराबाद की कंप्यूटर इंजीनियर श्वेता मोहंती दूसरे स्थान पर आई हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, मध्य प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में लड़कियां ही अपने-अपने राज्यों में अव्वल हैं। परीक्षा के सफल उम्मीदवारों में 717 पुरुष और 203 महिलाएं हैं।

इन नतीजों से यह तो पता चलता ही है कि लड़कियां अपनी जगह मेहनत से अर्जित कर रही हैं। भारत में प्रशासनिक सेवाओं के शिखर पर महिलाएं अपनी काबिलियत साबित कर चुकी हैं। कैबिनेट सचिव से लेकर विदेश सचिव तक के पदों पर वे रह चुकी हैं, और उनके कार्यकाल में बेहद मुश्किल और नाजुक मसलों पर सफलतापूर्वक फैसले किए गए और उन पर अमल किया गया।

इस मायने में सिविल सेवाओं में लड़कियों की कामयाबी महिलाओं को अधिकार संपन्न बनाने के मामले में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है। सिर्फ महिलाएं ही नहीं, समाज के वे तमाम वर्ग, जो आम तौर पर बहुत आगे नहीं रहे, उनका प्रतिनिधित्व भी इन परीक्षाओं में बढ़ा हुआ दिखता है। इन परीक्षाओं को भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आईना माना जा सकता है। नतीजे यह तो बताते ही हैं कि धीरे-धीरे ही सही हमारी वर्तमान व्यवस्था समाज के कई तबकों का सशक्तीकरण कर रही है।

पहले महानगरों के प्रतिष्ठित शिक्षा संस्थानों से पढ़े हुए नौजवान ही इन परीक्षाओं में ज्यादा कामयाब होते थे, अब ग्रामीण पृष्ठभूमि से, आम मध्यमवर्गीय या निम्न मध्यमवर्गीय परिवारों से आए नौजवान भी आत्मविश्वास के साथ इन परीक्षाओं में बैठते हैं और सफल भी होते हैं। गुजरात में जिस नौजवान ने टॉप किया है, वह तो कच्छ के एक छोटे-से गांव से आया है।

एक बेहद अच्छी खबर यह है कि इस परीक्षा में कश्मीर के छह नौजवान सफल रहे हैं। पिछले बरस एक कश्मीरी नौजवान शाह फैसल, सिविल सेवा परीक्षा में अव्वल आया था। यह जरूरी है कि ज्यादा से ज्यादा कश्मीरी नौजवान केंद्रीय सेवाओं में आकर देश के प्रशासन में बड़ी भूमिका निभाएं।

जब हम सिर्फ कश्मीर नहीं, समूचे देश के प्रशासन में कश्मीरियों को ज्यादा बड़ी भूमिका देंगे, तो इससे कश्मीरी नौजवानों में अलगाव खत्म होने में बड़ी मदद मिलेगी। कश्मीरी नौजवानों की समस्या यह है कि उनके लिए कोचिंग जैसी सुविधाएं बहुत कम हैं। अगर भारत सरकार शिक्षा और नौकरियों में आगे बढ़ने के लिए इन नौजवानों को सुविधाएं दे, तो इसका कश्मीर मसले के समाधान में अहम योगदान होगा।

इसी तरह महिलाएं अगर प्रशासन में ज्यादा संख्या में आती हैं, तो प्रशासन को ज्यादा मानवीय और संवेदनशील बनाने में सहायता मिलती है। अगर किसी पिछड़े सामंती किस्म के इलाके में डीएम या एसपी जैसे पदों पर महिलाएं हों, तो इससे उस इलाके में लोगों के विचार बदलने में बड़ा फायदा होता है।

महिलाओं से संबंधित सामाजिक समस्याएं समझने और उन्हें हल करने में भी महिला प्रशासक ज्यादा सक्षम होती हैं। वे अक्सर लड़कियों और उनके परिवारों के लिए मिसाल का काम करती हैं। इसी तरह ग्रामीण इलाकों से आए प्रशासक ग्रामीणों की समस्याएं हल करने के लिए ज्यादा उपयोगी सिद्ध होते हैं।

आजादी के इतने साल बाद भी सरकारी तंत्र का रूप काफी हद तक ‘माई-बाप’ वाला ही है, वह विकास और सेवा के सांचे में बहुत धीरे-धीरे ढल रहा है। अगर ठीक से प्रेरित किया जाए, तो समाज के विभिन्न वर्गो और तबकों से आए प्रशासक इस दृष्टि से बदलाव के वाहक हो सकते हैं। यानी आज जो आगे आ रहे हैं, वे पूरे देश को आगे ले जाएंगे।

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