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घातक लापरवाही

राजधानी में हर साल गरमियों के दिनों में जल-जनित बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है और इसमें प्रशासनिक लापरवाही की बड़ी भूमिका होती है। न तो यहां के बाशिंदों को स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति की जाती है और न ही दूषित खाद्य व पेय पदार्थो की बिक्री पर रोक ही लगाई जाती है। नतीजा होता है कि हर साल न जाने कितने ही लोग इन बीमारियों की चपेट में आते हैं और न जाने कितने मर जाते हैं। प्रशासन सिर्फ विज्ञापन दिखाकर अपने फर्ज से मुक्ति पा लेता है। दोषियों के खिलाफ अभियान चलाने जैसी पहल कभी नहीं की जाती। इस साल फिर वही स्थिति सामने आ रही है। एनसीआर के अस्पतालों में जल-जनित बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ने लगी है। अब जब राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का यह आलम है, तो देश भर की स्थिति क्या होगी, इसका आप खुद ही अनुमान लगा सकते हैं।
ओमप्रकाश प्रजापति, नंदनगरी, दिल्ली-93

अमेरिका की नीयत
दुनिया से आतंकवाद का खात्मा जरूरी है। जैसा कि हम देख रहे हैं कि अमेरिका इसके लिए अपने आपको सक्रिय किए हुए है। मगर सवाल यह पैदा होता है कि जिस तरह वह अपने दुश्मनों को मार गिराने के लिए तमाम अंतरराष्ट्रीय कायदे-कानूनों को नजरअंदाज करते हुए किसी भी देश पर हमला करने से परहेज नहीं करता, वैसे ही दाऊद इब्राहिम के मामले में कार्रवाई के सवाल पर वह अब तक क्यों खामोश है? फिर जो आतंकी अमेरिका में सीआईए की पनाह लिए हुए हैं और ऐश की जिंदगी गुजार रहे हैं, उनका खात्मा किस तरह मुमकिन है? क्या मुंबई में हुए 26/11 कांड के दोषी डेविड हेडली को जिंदा या मुर्दा पकड़ने के लिए अमेरिका अपने यहां एबटाबाद जैसे ऑपरेशन की इजाजत देगा? अगर नहीं, तो फिर कैसे समझें कि अमेरिका की नीयत में कोई खोट नहीं है।
फैज अहमद फैज

अतिक्रमण अभियान
अतिक्रमण अभियान को लेकर झारखंड की राजनीतिक गतिविधि तेज हो गई है। एक समय डोमिसाइल के जरिये बाहरी लोगों को भगाने की नाकाम कोशिश करने वाले बाबूलाल मरांडी आज उनके मसीहा बनते फिर रहे हैं। उनकी पार्टी के विधायक झोपड़ियां उजड़ने से बैचेन हैं। मगर वे उन लोगों के दुख जानने की कोशिश नहीं कर रहे, जो उनके शासन में उजाड़ दिए गए।
खालिक नजर

खेलों में गैरबराबरी
हमारे देश का राष्ट्रीय खेल तो हॉकी है, लेकिन क्रिकेट की चकाचौंध ने इसे रसातल में पहुंचा दिया है। अब हाल की ही बात लीजिए, वर्ल्ड कप टूर्नामेंट के दौरान इंडिया-ऑस्ट्रेलिया, इंडिया-पाकिस्तान, इंडिया-श्रीलंका के बीच खेले गए मैचों के वक्त देश भर में हर जगह सन्नाटा पसर गया था, चाहे वे सरकारी कार्यालय हों या प्राइवेट स्कूल हों या फिर अस्पताल, सभी टीवी से चिपके दिख रहे थे। तो फिर अब इसका क्या निष्कर्ष निकाला जाए? क्रिकेट के लिए तो आप हर तरह के कोच रख लेंगे, बॉलिंग कोच, बैटिंग कोच, फिटनेस कोच, यहां तक कि विदेशी कोच रखने से भी कोई परहेज नहीं, फिर ये सब सुविधाएं हॉकी के लिए भी क्यों नहीं? माना कि क्रिकेट आज विश्व भर में मशहूर है, लेकिन मेहनत तो हर खेल का खिलाड़ी करता है। हर खेल बराबर है, इसलिए सभी खेलों को पर्याप्त सुविधाएं मिलनी चाहिए, ताकि वे भी उस मुकाम पर पहुंच सकें, जहां आज क्रिकेट है।
नमिता श्रीवास्तव

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