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शिक्षा संस्थानों का हो साथ तो बन जाए बात

फेसबुक के निर्माता मार्क जकरबर्ग ने अपनी गर्लफ्रेंड से ब्रेकअप के बाद नेटवर्किग साइट फेसबुक बना डाली थी। वहीं भारत के छात्र उद्यमियों की सुनें तो वे केवल अपने व्यवसाय को मुनाफादेय बनाने के लिए रोजाना ऐसे झटकों को झेलते हैं। हालांकि, हर किसी में ऐसे ब्रेकअप को झेलने का दम नहीं होता, कुछ विद्यार्थी उद्यम एकाध वर्ष में दम तोड़ देते हैं तो अन्य कुछेक महीनों में ही।

मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (एमडीआई) में ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर के प्रोफसर प्रीतम सिंह के अनुसार, ‘कुछ स्टार्ट-अप विचार के स्तर पर कमजोर होने के कारण असफल हो जाते हैं, जबकि एंटरप्रिन्योरशिप की बुनियादी जरूरत ही है इनोवेशन(नई खोज)। भारत में विचारों पर सतही काम होता है, सूक्ष्म पक्षों पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता। इनोवेशन की प्रक्रिया एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में आगे बढ़ती है, एक ऐसा गुण जो अमेरिकन डीएनए में अधिक पाया जाता है। यही वजह है कि विचारों का नयापन भारत और जापान की तुलना में अमेरिका और चीन में अधिक देखने को मिलता है।’

शिक्षा ढांचे में सुधार की जरूरत
स्टूडेंट्स स्टार्ट-अप की यह समस्या कई बार भारतीय शिक्षा व्यवस्था में ढांचागत कमी के कारण भी बढ़ जाती है। इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस, हैदराबाद में वाधवानी एंटरप्रिन्योरशिप सेंटर के एग्जीक्युटिव कृष्ण तनुकू के अनुसार,‘भारतीय इंजीनियरिंग स्कूलों की समस्या है कि वहां बिजनेस पक्ष को नजरअंदाज कर दिया जाता है। वे तकनीक में सक्षम हैं तो हम बिजनेस पहलुओं में, दोनों की खाई को कम कर हम इस अंतराल को भरने का प्रयास कर रहे हैं। एक ऐसा ईको-सिस्टम बनाया जा रहा है, जहां कला, विज्ञान, योजना, वित्त, कानून, तकनीक व बिजनेस सभी संकायों से जुड़े छात्र मिल कर काम कर सकें।

स्टेनफोर्ड व इसी तरह के अन्य अमेरिकी विवि. में विभिन्न अनुशासन व संकायों में पारस्परिक भागेदारी, स्टार्ट-अप व्यवसायों को बढ़ावा देने में खासी भूमिका निभाती है। आईआईएम, बेंग्लुरू में एंटरप्रिन्योरियल लर्निग सेंटर के चेयरपर्सन के. कुमार कहते हैं, ‘परंपरागत रूप से भारत में प्रबंध व तकनीकी संस्थान अपने स्तर पर स्वतंत्र होकर अच्छा काम कर रहे हैं, पर अमेरिका में छात्रों की पहुंच अन्य अनुशासनों में भी होती है। वहां पाठय़क्रमों को विभिन्न कोर्सेज के पारस्परिक जुड़ाव को ध्यान में रख कर ही डिजाइन किया जाता है। अमेरिकी विवि. में फैकल्टी की भागीदारी भी अधिक है। उनकी भूमिका महज मेंटरिंग तक नहीं होती, वे उसमें निवेश भी करते हैं। इतना ही नहीं, हमारे यहां एंटरप्रिन्योरशिप को अधिक तवज्जो भी नहीं दी जाती।’

स्टार्ट-अप कोशिशें
इंफोसिस और इसी तरह के एकाध अपवाद को छोड़ दिया जाए तो 1980-90 के प्रारंभ में अधिकतर कंपनियां पारिवारिक बिजनेस घरानों द्वारा शुरू की गई थीं। विभिन्न संस्थानों से निकलने वाले प्रोफेशनल ऐसी ही कंपनियों में अच्छे सैलरी पैकेज पर अपनी सेवाएं दे रहे थे, पर अपनी कंपनी शुरू करने की कोशिशें काफी कम थीं। 

एमबीए पाठ्यक्रमों का ध्यान भी प्रक्रिया और व्यवस्था पर अधिक रहा, उद्यमशीलता पर कम। आज अधिकतर  प्रतिष्ठित  इंजीनियरिंग कॉलेज और बी-स्कूल एंटरप्रिन्योरशिप से जुड़े कोर्सेज करा रहे हैं। आईआईटी, दिल्ली में 1992 में स्थापित फाउंडेशन फॉर इनोवेशन एंड टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (एफआईटीटी) छात्रों के लिए टेक्नोलॉजी , कंसल्टिंग और ट्रेनिंग सेंटर के तौर पर काम कर रहा है। संस्थान के मैनेजिंग डायरेक्टर अनिल वाही कहते हैं, पहले पांच सालों में संस्थान ने दो कंपनियों का निर्माण किया। स्टार्ट-अप को अनुकूल माहौल देने की सही कोशिशें वर्ष 2005 से शुरू हुईं, जिसके बाद से 32 कंपनियों का जन्म हो चुका है।

स्टार्ट-अप कंपनियों को फंड उपलब्ध कराने और अपना मार्गदर्शन देने के क्षेत्र में काम कर रही मोरफिस के सहसंस्थापक समीर गुगलानी के अनुसार पिछले दो सालों में भारत के टॉप 20 इंजीनियरिंग कॉलेजों के करीब  200 छात्रों ने अपना स्टार्ट-अप शुरू किया है, जिसमें से लगभग 20 प्रतिशत पढ़ाई पूरी करने के बाद भी काम कर रहे हैं। शेष 80 प्रतिशत कॉलजों में इन दो सालों में 320 छात्रों के स्टार्ट-अप शुरू हुए, जिनकी सफलता दर 10 रही है।

संस्थानों की भूमिका
स्टूडेंट स्टार्ट-अप के शुरुआती दिनों में छात्रों की अधिकतर ऊर्जा प्रोडक्ट बनाने, उसकी उपयोगिता और प्रासंगिकता को उभारने में लग जाती है। इसमें से अधिकतर कार्यो को कॉलेजों और प्रोफेशनल संस्थानों के इन्क्यूबेशन संस्थानों में अंजाम दिया जा सकता है। छात्र इन्क्यूबेशन सेंटरों में काम करते हुए अपने विचार को स्थापित कर पाते हैं और यह भी जान पाते हैं कि उनका विचार व्यावसायिक दृष्टि से कितना सफल है। पर यही वह महत्त्वपूर्ण समय है, जब छात्रों को इन्क्यूबेटर सेंटर से बाहर जाकर अपने प्रोजेक्ट में पैसा लगाने की जरूरत होती है।

फंड की कमी कई स्टार्ट-अप को बंद होने पर मजबूर कर देतीहै। यहीं से शुरू होती है मोरफिस जैसी कंपनियों की भूमिका। इच्छुक स्टूडेंट्स को चयन प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। चुने गए छात्रों को पांच लाख रुपये का फंड दिया जाता है और ग्रेजुएशन पूरी होने से पहले चार महीने तक सप्ताह में 10 से 12 घंटे की मेंटरिंग दी जाती है।

एक तरह से यह कंपनियां छात्रों के लिए फिनिशिंग स्कूल का काम करती हैं। गुगलानी के अनुसार, ‘ऐसी कंपनियों को चुना जाता है, जिनमें प्रमोटर को अधिक फायदा होने की संभावना होती है।’ अंत में सबसे बड़ी चुनौती एमडीआई के प्रीतम सिंह के अनुसार आपके विचार की गुणवत्ता पर टिकी होती है। वहीं आईआईएम-बी के के. कुमार मानते हैं कि  ऐसे स्टूडेंट्स स्टार्ट-अप को अधिक सफलता मिलती है, जिनके विचार में नयापन होता है। यह प्रयोगशाला के स्तर पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में की गई कोई खोज भी हो सकती है या फिर कोई नया बिजनेस मॉडल।

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