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भ्रष्टाचार के खिलाफ आरटीआई को बना लिया हथियार

भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग के लिए जिले के एक शख्स ने आरटीआई को अपना हथियार बना लिया है। समस्याओं को देखकर चुप रहना 35 वर्षीय कुलदीप शुक्ला की आदत नहीं है। जिले के विकास के लिए उन्होंने लगभग सभी सरकारी विभागों का दरवाजा खटखटाया है। कुलदीप अब तक सूचना के अधिकार कानून 2005 के तहत 250 से अधिक सूचनाएं मांग चुके हैं। आज कुलदीप की पहचान आरटीआई से होती है।

शिक्षक के पुत्र कुलदीप शुक्ला का रुझान छात्र जीवन से ही समाजसेवा की ओर था। स्नातक की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कई समाजसेवियों के साथ जुड़कर काम किया। 12 साल गंवाने के बाद भी कुलदीप को सफलता नहीं मिली।


जनसमस्याओं को लेकर वे जिसके पास भी जाते थे वहां ठोकर खानी पड़ती थी। न तो पुलिस उनकी सुनती थी और न ही अधिकारी। 2005 में सूचना का अधिकार कानून लागू हुआ तो कुलदीप के मन में उम्मीद की एक किरण जगी। हालांकि इस कानून की ताकत समझने में उन्हें दो साल लग गए।

नगर की रेलवे क्रॉसिंग पर सैकड़ों लोग आए दिन जाम से जूझते थे। लोगों की मांग के बावजूद  पुल का निर्माण नहीं हो पा रहा था। कुलदीप ने हिम्मत जुटाई और सबसे पहले अगस्त 2007 में उन्होंने मध्य रेलवे से रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज के बारे में सूचना मांगी। जवाब आया कि मामला विचाराधीन है। 29 सितंबर 2007 को रेलवे ने कुलदीप को फिर से चिट्ठी भेजकर सूचना दी कि रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज का निर्माण कराया जाएगा।

अखबारों के जरिये इसकी जानकारी पाकर लोग झूम उठे। आज ओवरब्रिज 40 फीसदी बनकर तैयार हो गया है। इसके बाद तो कुलदीप का हौसला बुलंद हो गया। जनसमस्याओं के निराकरण और विकास के लिए कुलदीप ने कमर कस ली। उन्होंने सरकारी योजनाओं में हो रही धांधली और विकास कार्यो में देरी पर आरटीआई के तहत सूचना मांगनी शुरू कर दी।

कुलदीप ने तीन सालों में 250 से अधिक सूचनाएं मांगी। कुलदीप ने जैन समाज को अल्पसंख्यक का दर्जा देने, पुल पर अवैध वसूली बंद कराने, एफएम रेडियो चालू कराने, तुलसी आवसीय योजना के तहत विकास कार्यो में लेटलतीफी, गरीबरथ का स्टापेज बांदा स्टेशन पर करने के बारे में आदि सूचनाएं मांगी। खुशी की बात यह है कि कुलदीप की इन सूचनाओं पर गंभीरता से विचार किया गया और कई मांगें पूरी भी हुईं। वे कहते हैं कि सूचना के अधिकार कानून ने नई शक्ति दी है। अब तक की मांगी गई सूचनाओं में अधिकतर पर अमल हुआ है।

कुलदीप कहते हैं कि ये बातें उनकी पत्नी और बच्चों को पसंद नहीं है। फिर भी वह समाजसेवा को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। कुलदीप अपनी जेब में हमेशा पोस्टल आर्डर लेकर चलते हैं। जहां समस्याएं देखीं आरटीआई के तहत सूचना मांगकर उसके निराकरण में जुट जाते हैं।  इसके लिए कुलदीप को अरविंद केजरीवाल की तरफ से वर्ष 2009 में एप्रीसिएशन सर्टिफिकेट भी मिल चुका है।

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