DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

क्यों उबल रहे हैं किसान?

भारतीय किसानों में सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहण के विरुद्घ धधकती असंतोष की लहर दादरी, नंदीग्राम, सिंगुर, नियामगिरि, जगतसिंहपुर, जैतापुर होती हुई अब ग्रेटर नोएडा पहुंच गई है। उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार 1187 गांवों की 2.37 लाख हेक्टेयर भूमि में फैली हुई यमुना एक्सप्रेसवे की अति महत्त्वाकांक्षी योजना को अगले विधानसभा चुनाव से पूर्व पूरा कराने में जी-जान से लगी हुई है।

विधानसभा चुनाव 2012 में होने हैं, लेकिन पश्चिम उत्तरप्रदेश के ग्रेटर नोएडा, आगरा, अलीगढ़ और मथुरा जैसे जनपदों में उग्र किसान आंदोलन देश की राजनीति में फिर से किसान राजनीति के पुनरागमन का संकेत देता है। अगर पश्चिम बंगाल में सिंगुर का किसान असंतोष 34 वर्ष पुराने वाममोर्चा के किले में सेंध लगा सकता है तो उप्र में भी इसके राजनैतिक दुष्परिणामों को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए।

नौ प्रतिशत की वार्षिक विकास दर से बढ़ रही भारतीय अर्थव्यवस्था को ज्यादा सड़कें, बिजली, कारखाने, बांध, मकान और नये शहर चाहिये। इन सबको जिस जमीन पर बनाया जाना है, वह या तो कृषि योग्य उपजाऊ जमीन होगी या वह परती जमीन, जिस पर कुछ पैदा नहीं होता।

देश के कई राज्यों यथा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, महाराष्ट्र और गुजरात के किसानों में जो गुस्से का लावा फूटता दिखाई दे रहा है, वह उनकी उपजाऊ जमीनों के राज्य सरकारों द्वारा किये जा रहे अधिग्रहण के विरुद्घ है। भारतीय किसान भले ही अपनी मौजूदा पैदावार और कृषि आय में संत्रस्त हो, किन्तु अपनी जमीन से उसका जो भावनात्मक लगाव है, वह हजारों साल से चला आ रहा है।

1991 के बाद के उदारीकरण के दौर में कृषि और निर्माण उद्योगों में विकास की दर आमतौर पर धीमी रही। वैश्वीकरण व उदारीकरण के दुष्प्रभावों के परिणाम स्वरूप लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योगों को भी अपने वजूद को बचाने के लिये संघर्ष करना पड़ा।

भारत में इस समय 55 खरबपतियों के पास करीब 11 लाख करोड़ रुपए की दौलत है, जो देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद (जीएनपी) का 17.2 प्रतिशत है। देश की धन-संपदा में वृद्घि से किसी भी व्यक्ति को ऐतराज नहीं होना चाहिये। किन्तु सारी दौलत कुछ व्यक्तियों के हाथों में सिमट कर रह जाये, यह न केवल जनतांत्रिक व्यवस्था, बल्कि स्वयं पूंजीवाद के भविष्य के लिये भी चिंताजनक है।

ग्रेटर नोएड़ा आदि स्थानों में किसानों के भड़कते असंतोष को ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ के दुष्परिणामों से जोड़ कर देखा जाना चाहिये। आज भारत में आम आदमी को अच्छे स्कूल, अच्छे अस्पताल, अच्छी सड़कें, अच्छा भोजन, स्वच्छ पेयजल और सस्ती ऊर्जा की जरूरत है। इसके विपरीत सरकार और नव-धनिक वर्ग, पांच सितारा होटल, रिजॉर्ट, मॉल, नाइट सफारी जैसी परियोजनाओं में ज्यादा दिलचस्पी दिखा रहे हैं।

उप्र में मायावती सरकार यह कह रही है कि उसने किसानों को 33 वर्षो के लिये प्रति एकड़ रु. 20 हजार की वार्षिकी और कुल जमीन का 7 प्रतिशत भाग रिहाइशी प्लॉट देकर उनके हितों का ध्यान रखा है। पश्चिमी उप्र के किसान इस मुआवजे से संतुष्ट नहीं हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि राज्य सरकार और यमुना एक्सप्रेसवे से जुड़ी रीयल एस्टेट कंपनी के बेतहाशा मुनाफों के मुकाबले उनके मुआवजे कुछ भी मायने नहीं रखते।

ज्ञातव्य है कि 2002 में ग्रेटर नोएडा के 124 गांवों के किसानों से एक्सप्रेसवे बनाने के लिये 50 रु. से 300 रु. वर्ग मीटर की दरों पर जमीन अधिगृहीत की गई थी। आज उसी इलाके में स्पोर्ट्स सिटी में रिहायशी जमीन 15000 रु. वर्ग मीटर पर बेची जा रही है। ग्रेटर नोएडा में रिहायशी जमीन की आधिकारिक दरें वर्तमान में 1,50,840 रु. से 42,560 रु. वर्गमीटर है। वाणिज्यिक उपयोग के लिये यही दरें 60,500 रु. से 1..37 लाख रु. प्रति वर्ग मीटर है।

उपरोक्त आंकड़े किसानों को भड़काने के लिये काफी हैं। किसानों में अब जागरूकता बढ़ रही है, क्योंकि वे क्रोनी कैपिटलिज्म का नंगा नाच अपनी आंखों से देख रहे हैं। गांवों और शहरों के बीच में जीवन स्तर और बुनियादी नागरिक सुविधाओं की उपलब्धता की खाई लगातार बढ़ रही है।

केबल टीवी़, डिश टीवी और टेलीकॉम क्रांति ने ग्रामीण जगत में उपभोक्ता वस्तुओं तथा सुविधापूर्ण जीवन के सपने उगा दिये हैं, जिन्हें किसान-मजादूर परिवार पूरा नहीं कर पा रहे। यह मानते हुए कि भविष्य में भी देश के आर्थिक-विकास की जरूरतों को पूरा करने के लिये भूमि अधिग्रहण की जरूरत पड़ती रहेगी, इस समस्या के ऐसे समाधान खोजने होंगे, जो किसानों के दीर्घकालीन हितों की अनदेखी न करें।

भूमि अधिग्रहण कानून दो वर्षो से संसद की स्वीकृति के लिये लंबित है। इस बिल में भूमि अधिग्रहण के लिये सरकारों की भूमिका को कम किया गया है। बिल में यह भी प्रावधान है कि प्राइवेट कंपनियां अगर अपनी औद्योगिक परियोजनाओं के लिये भूमि खरीदना चाहें तो कम से कम 70 प्रतिशत भूमि बाजार-दरों पर खरीदें। 

अगले 20 वर्षो में नगरीय विकास, खनन और उद्योगों की स्थापना के लिये देश के कुल क्षेत्रफल के 2 प्रतिशत भाग की जरूरत होगी। अगर किसानों से उनकी भूमि, उनके दीर्घकालीन हितों को ध्यान में रखते हुए बाजार दरों के आधार पर खरीदी जाये तो किसानों का वर्तमान उग्र आंदोलन शांत हो सकता है।

सवाल उठना चाहिये कि क्या भूमि अधिग्रहण के ऐसे नये मॉडल बनाये जा सकते हैं, जो किसानों को बदहाल न बना कर उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थान दे सकें? ‘समावेशी पूंजीवाद’ के नाम से भारत में कुछ नये प्रयोग हुए हैं जैसे फैब-इंडिया (दिल्ली), जिंदल स्टील वर्क्स (पं. बंगाल), श्री रेणुका शुगर्स (कर्नाटक) और मागरपट्टा सिटी (पुणे)।

इन प्रयोगों की समावेशी विकास के लिये अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हुई है। इस टाउनशिप का निर्माण कार्य भी किसान परिवारों ने स्वयं किया, जिसके लिये कंपनी ने उन्हें हर प्रकार का प्रशिक्षण दिया था। देश में नये नंदीग्राम व सिंगुर पैदा न हों, उसके लिये जरूरी है कि केंद्र व राज्य सरकारें किसानों के हितों की गारंटी दें। क्रोनी कैपिटलिज्म देश हित में नहीं है। समावेशी पूंजीवाद इससे बेहतर विकल्प हो सकता है।

विकास बनाम जनअसंतोष 

नंदीग्राम- नवंबर 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया की एक कंपनी सालिम ग्रुप के स्पेशल इकॉनोमिक जोन के लिए जमीन अधिग्रहण के विवाद में पुलिस के साथ हुए संघर्ष में 14 किसानों की जान गई।

सिंगुर- पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा के नैनो कार प्लांट के विरोध में किसानों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 किसानों की मौत हुई। इस विरोध के कारण टाटा के नैनो प्लांट को गुजरात के आणंद में स्थानांतरित करना पड़ा।

अमरनाथ श्राइन बोर्ड- 2008 में कश्मीर घाटी में सरकार द्वारा श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड को 99 एकड़ जमीन देने के विरोध में पांच लाख प्रदर्शनकारी सड़कों पर उतर आए। हिंसा में सात लोग मारे गए,100 से ज्यादा घायल हुए।

दादरी- 2004 में मुलायम सिंह के शासनकाल में उप्र के गाजियाबाद जिले के दादरी में 2500 एकड़ भूमि का अधिग्रहण रिलायंस (अनिल अंबानी समूह) के गैस आधारित पावर प्लांट के लिए किया गया था। किसान मुआवजे की रकम से असंतुष्ट थे।

नर्मदा घाटी परियोजना- नर्मदा घाटी में बनने वाले बांधों के खिलाफ 1985 में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के बैनर तहत बड़े पैमाने पर जन आंदोलन शुरू हुए, जिसका नेतृत्व मेधा पाटकर और बाबा आम्टे ने किया। इस परियोजना के तहत सरदार सरोवर बांध सहित 30 बड़े, 135 मध्यम और 3000 छोटे बांधों के निर्माण को स्वीकृति दी गई थी।

टिहरी बांध परियोजना- उत्तराखंड में भागीरथी नदी पर चल रही इस जल विद्युत, सिंचाई और पेयजल परियोजना को पर्यावरण क्षेत्र में काम कर रहे संगठनों व स्थानीय लोगों के भारी विरोध और कानूनी दांवपेंचों का सामना करना पड़ा है।

नियामगिरी- उड़ीसा की नियामगिरी पहाड़ियों में वेदांता र्सिोसेस की इस बॉक्साइट खनन परियोजना को आदिम जनजातियों और पर्यावरण संगठनों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। अंतत: अगस्त 2010 में पर्यावरण मंत्रालय ने इस परियोजना पर रोक लगा दी।

जैतापुर परमाणु ऊर्जा संयंत्र- महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के इस परमाणु पावर प्लांट का जम कर विरोध हो रहा है। 18 अप्रैल 2011 को गुस्साई भीड़ ने एक अस्पताल पर हमला कर दिया और कई बसों में आग लगा दी। इस प्लांट के विरोध में हुए प्रदर्शनों में एक व्यक्ति की मौत हो गई।

अलीगढ़- पिछले साल 14-15 अगस्त को अलीगढ़ के टप्पल में हुई हिंसा में तीन किसान और एक पुलिसकर्मी की मौत हो गई थी।

भट्टा-पारसौल गांव (ग्रेटर नोएडा)- उत्तर प्रदेश के गौतम बुद्ध नगर जिले (नोएडा) के भट्टा-पारसौल गांव में मई के पहले सप्ताह में किसानों और प्रशासन के बीच हिंसक झड़प में तीन जवानों और तीन किसानों की मौत हो गई।

जगतसिंहपुर- इस जिले में दक्षिण कोरिया की स्टील कंपनी ‘पॉस्को’ की परियोजना का स्थानीय लोगों और राज्य के विपक्षी दलों, खासकर कांग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा है। 12 बिलियन डॉलर की इस स्टील, खनन और पोर्ट परियोजना को अंतत: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:क्यों उबल रहे हैं किसान?