DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

वामपंथी ठेकेदारी की साहित्यिक परंपरा

हालांकि वामपंथी पूंजीवाद के सबसे बड़े शत्रु हैं, लेकिन जिस ठेकेदारी की परंपरा का शुरुआत पूंजीवाद ने की थी, वह वामपंथियों को काफी प्रिय है।

वामपंथ और ठेकेदारी में यह रिश्ता क्यों है, यह थोड़ा खोजना पड़ेगा, लेकिन वामपंथ और ठेकेदारी में बड़ी गहरी छनती है। इसीलिए आप ध्यान दें, यह खबर आपने क्या कहीं पढ़ी है कि नक्सलियों ने जंगल के किसी ठेकेदार या खदान के ठेकेदार या किसी और किस्म के ठेकेदार को मार दिया। उनके शिकार आमतौर पर पुलिसवाले होते हैं या कभी कभार दूसरे सरकारी कर्मचारी। नक्सलवादी इन ठेकेदारों के संरक्षण का ठेका लेते हैं और बदले में उनसे कुछ मेहनताना भी लेते हैं।

पश्चिम बंगाल के वाम मोर्चा को एक बार राज्य सरकार चलाने का ठेका क्या मिला कि उन्होंने दूसरी बार किसी को टेंडर भरने ही नहीं दिया। आखिर प्रदेश की हालत उस सड़क जैसी हो गई, जिसे बनाने का ठेका साल दर साल एक ही ठेकेदार को मिलता है और धीरे-धीरे उस सड़क से सड़क होने का छोटे से छोटा चिह्न् तक छिन जाता है।

पश्चिम बंगाल में वामपंथियों को सरकार चलाने का ठेका मिला था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने प्रशासन, पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य, अपराध यहां तक कि राजनैतिक धरना, प्रदर्शन तक अपनी पार्टी के नाम कर लिया। अब वहां विरोधियों को धरना, प्रदर्शन, बंद, रैली वगैरा करने का मौका ही नहीं मिलता।

अगर पश्चिम बंगाल में उनका ठेका खत्म हो भी गया, तो फिक्र नहीं, एक जगह उनके लिए हमेशा बनी रहेगी, चाहे सारी दुनिया से मार्क्सवाद उखड़ जाए। और वह जगह है हिंदी साहित्य। हिंदी साहित्य में कोई ममता बनर्जी नहीं है, जो वाम मोर्चे की ठेकेदारियों को चुनौती दे सके।

हिंदी साहित्य में जहां-जहां वामपंथी हैं, और वे लगभग हर जगह हैं, महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, प्रशासन, अनुवाद, पुरस्कार, विदेश यात्रा, वहां वे किसी दूसरे को घुसने ही नहीं देते। हो सकता है कि यह दूसरी भाषाओं में भी हो, लेकिन हिंदी साहित्य की हालत पश्चिम बंगाल से बेहतर नहीं है। कॉमरेड, आपको यहां पर कोई खतरा नहीं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:वामपंथी ठेकेदारी की साहित्यिक परंपरा