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जो हम देखना चाहते हैं

एक मीटिंग में उसने कह दिया था, ‘सर आप मुझे समझ नहीं पाए।’ क्या वह उसे समझ नहीं पाए थे? उन्हें तो लगता था कि उसे वही ठीक से समझते हैं। शायद उससे भी बेहतर।

जो है, जैसा है। उसी रूप में देखना बहुत मुश्किल होता है। डॉ. नैथन हैफलिक मानते हैं कि दरअसल, हम दूसरे में वह देखते हैं, जो देखना चाहते हैं। हम सब तरफदारी करते हैं। मैं भी और आप भी। वह साउथ फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी में सोशल साइकोलॉजी विभाग से जुड़े हैं। हाल ही में उनकी किताब आई है, ‘द बिग क्वेश्चन्स।’
 
हम सभी किसी न किसी ओर झुके होते हैं। बुनियादी तौर पर हम पक्षपाती हैं। असल में कोई तटस्थ हो ही नहीं सकता। हमारे भीतर उसके लिए एक खास जगह होती है। प्रिंस्टन की ऐमिली प्रोनिन उसे ‘बायस ब्लाइंड स्पॉट’ कहती हैं।
 
हम एक दूसरे को कोसते रहते हैं कि वह तो ‘बायस्ड’ है। लेकिन हम उससे उबर नहीं पाते। कोई किसी किस्म का तरफदार होता है। कोई और तरह का तरफदार। हम जब किसी पर कोई टिप्पणी करते हैं, तो उसमें अपनी ही राय जाहिर कर रहे होते हैं। जरूरी नहीं कि उसमें उसकी शख्सीयत का सही आकलन हो रहा हो।
 
यह सही है कि हमें किसी का भी ठीक-ठीक आकलन करना चाहिए। लेकिन यह बहुत आसान नहीं है। उसके लिए हमें कोशिश करनी पड़ती है। सबसे पहले यह मानना ही पड़ता है कि हमारे फैसले में तरफदारी हो सकती है।

असल में जब कोई हमसे इशारा करता है कि हम तटस्थ नहीं हैं। तो हमारी पहली प्रतिक्रिया होती है कि हम तो ऐसा नहीं करते। लेकिन थोड़ा-सा अपने को कुरेदने से समझ में आता है कि हम भी एक ओर झुके होते हैं। इसे मान लेने पर ही हम तटस्थ होकर सोचने की ओर आगे बढ़ सकते हैं। तो सबसे पहले जो है, सो है, उसे मान लेना चाहिए।                  

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