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किसानों के बीच राहुल

दूसरे नेता ग्रेटर नोएडा के उन ग्रामीण इलाकों में नहीं पहुंच पाए, जहां जमीन अधिग्रहण के विरोध में किसानों का आंदोलन चल रहा है, वहां कांग्रेस नेता राहुल गांधी मोटरसाइकिल पर सवार होकर पहुंच गए।

सुबह-सुबह राहुल सुरक्षा बलों को चकमा देकर भट्टा पारसौल गांव पहुंच गए। तमाम राजनैतिक पार्टियों के नेता किसानों के आंदोलन को समर्थन दे रहे हैं और सबकी नजर उत्तर प्रदेश में अपनी राजनैतिक स्थिति मजबूत करने पर है, राहुल इस काम में कुछ ज्यादा सफल हैं, क्योंकि उत्तर प्रदेश में वह लगातार आम आदमी से सीधे जुड़ने की कोशिश करते दिखते हैं। चुपचाप भट्टा पारसौल पहुंचकर भी उन्होंने अपनी उसी छवि को मजबूत किया है।

पिछले साल वह अलीगढ़ जिले के टप्पल गांव में भी गए थे, जहां किसान जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। राहुल में यह गुण तो है ही कि वह अपनी अभिजात छवि को तोड़ते हुए आम आदमी से सीधा रिश्ता बनाते हुए दिखते हैं। चाहे वह गांव में किसी दलित के घर रात बिताना हो या मुंबई की लोकल ट्रेन में सफर करना, इससे वह आम लोगों से सीधा तादात्म्य बना लेते हैं।

उनकी छवि यूं भी विवादास्पद नहीं है, वह एक साफ-सुथरे, ईमानदार व नेकनीयत युवा की तरह दिखते हैं और अपनी छवि भी उन्होंने सावधानीपूर्वक वैसी ही बनाई है। उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी के इस जमीनी काम का असर पिछले लोकसभा चुनाव में दिखा था।

कांग्रेस की अप्रत्याशित सफलता के पीछे जहां मतदाताओं की विकल्प की इच्छा दिखती थी, वहीं राहुल की छवि का भी असर था। लेकिन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को अगर सफलता को दोहराना है या बसपा का विश्वसनीय विकल्प बनना है, तो राहुल गांधी की बनाई जमीन, पर कुछ और काम भी करना होगा।

कांग्रेस की सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि न तो उसके पास स्थानीय नेता हैं न संगठन। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा सक्रिय दिखने वाले नेता राज्य प्रभारी दिग्विजय सिंह हैं, जो स्थानीय नहीं हैं। कांग्रेस के स्थानीय नेता या तो प्रभावहीन हैं या उनका प्रभाव एकाध जिले तक सीमित है। अगर कांग्रेस के पास बड़े कद का कोई स्थानीय नेता होता, तो वह इस वक्त उत्तर प्रदेश में बेहद मजबूत विकल्प बन सकती थी। उसकी प्रतिद्वंद्वी बसपा के पास मायावती जैसी मजबूत नेता हैं, जिनके नाम पर जनता का एक बहुत बड़ा वर्ग वोट डालता है और यह परिस्थिति बदलने वाली नहीं है।

कांग्रेस के पास रणनीति है, वह जानती है कि मतदाताओं के कौन से वर्ग उसके साथ आ सकते हैं। ये मतदाता भी कांग्रेस के साथ आ सकते हैं, अलबत्ता कांग्रेस मजबूत विकल्प बनने की राह पर हो। इसके लिए स्थानीय नेता चाहिए, पार्टी संगठन चाहिए, जिसकी कांग्रेस में कमी है।

ऐसा नहीं है कि कांग्रेस को सिर्फ चुनावी राजनीति के लिए नेता और संगठन चाहिए, इनकी जरूरत इसके लिए भी है कि जनता से जुड़े मुद्दे प्रभावशाली ढंग से उठाए जा सकें। राहुल चाहे बुंदेलखंड जाएं या ग्रेटर नोएडा, और उनके उद्देश्यों पर शक करने की कोई वजह नहीं है, लेकिन उनके जाने के बाद उनका काम आगे बढ़ाने के लिए भी तो स्थानीय नेताओं की जरूरत है।

पिछले बीस-पच्चीस साल में उत्तर प्रदेश की राजनीति जिस दिशा में चली है, उसमें नेतृत्व बसपा और सपा के पास चला गया और कांग्रेस कमजोर होती चली गई। इसलिए नया नेतृत्व तैयार करना बहुत आसान नहीं है। इसके लिए समाज के उन वर्गो तक जाना होगा, जिनसे समाज में नेतृत्व आने की उम्मीद है और वहां से जमीनी स्तर पर काम शुरू करना होगा। इस दौरे से राज्य में राहुल गांधी की लोकप्रियता और विश्वसनीयता जरूर बढ़ी है, लेकिन कांग्रेस को अभी बहुत दूरी तय करनी है।

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