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हैरान करता एक फैसला

सुप्रीम कोर्ट के सात सदस्यीय खंडपीठ ने अपने ताजा फैसले में कहा है कि देश में कार्यवाहक सरकार (सीटीजी) का सांविधानिक प्रावधान गैरकानूनी है। जनवरी 2000 में दायर एक याचिका की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने 13वें संविधान संशोधन को निरस्त कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि अदालत ने अपने निर्णय में यह भी कहा है कि अगले दो संसदीय चुनाव कार्यवाहक सरकार की देखरेख में कराए जा सकते हैं। साथ ही उसने फैसले में यह भी जिक्र किया है कि पार्लियामेंट चाहे, तो कार्यवाहक सरकार के मुखिया के रूप में शीर्ष अदालत के रिटायर्ड प्रधान न्यायाधीश या अपील-संबंधी खंडपीठ के किसी जज की नियुक्ति के प्रावधान को खत्म करने के लिए संविधान-संशोधन कर सकती है।

हम इस अदालती फैसले से हैरान हैं, क्योंकि हम समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर यह कह क्या रहा है। यदि कार्यवाहक सरकार के प्रावधान को गैरकानूनी मान लिया जाए, तो फिर आसानी से समझा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है। लेकिन ठीक इसके साथ ही अदालत के इस सुझाव ने मसले को उलझा दिया है कि अगले दो आमचुनाव, जो 2013 और 2018 में होने हैं, कार्यवाहक सरकार की देखरेख में कराए जा सकते हैं, ताकि विवादों से बचा जा सके।

एक ऐसे समय में, जब अगली कार्यवाहक सरकार के बारे में सियासतदां व नागरिक समाज बहस में जुट गए हैं, शीर्ष अदालत का यह फैसला सिर्फ भ्रम ही बढ़ाएगा। आखिर कोई भी प्रावधान, जिसे गैरकानूनी करार दिया जा चुका हो, अगले दो चुनावों तक अस्तित्व में कैसे रह सकता है? फिर इस बात की भी क्या गारंटी है कि कार्यवाहक सरकार के तहत कराए गए 2013 व 2018 के चुनावों को कानूनी चुनौती नहीं दी जाएगी?

चुनावों को लेकर सियासी दलों के आपसी अविश्वास के माहौल में कार्यवाहक प्रणाली ने स्थानीय और वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की साख बनाई है, ऐसे में इसके बारे में नए विवाद को जन्म देने के बजाय सुप्रीम कोर्ट यदि इस व्यवस्था को नब्बे दिन तक ही सीमित रखे जाने से संबंधित कोई आदेश देता, तो वह फैसला सार्थक होता।                                 

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