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संगीत ही मेरा अध्यात्म

संगीत ही मेरा अध्यात्म

प्रख्यात संतूर कलाकार पं. भजन सोपोरी के पुत्र व युवा कलाकार अभय सोपोरी अपने संतूर से निकली ध्वनि को उस एनर्जी तक पहुंचाने का माध्यम मानते हैं, जिसे परम सत्ता कहते हैं। उनके लिए संगीत ही अध्यात्म है। वह कहते हैं-

मैं हमेशा एक बात में विश्वास करता रहा हूं कि जो एब्सल्यूट है, वह है ऊर्जा। वह ऊर्जा ध्वनि के रूप में हमारे बीच है। तभी कहा गया है ‘नादादिनम जगत’। मेरा सौभाग्य है कि मैं इस ध्वनि से जुड़ा हुआ हूं और संतूर की सहायता से उस परम सत्ता को महसूस करता हूं, जिन्हें हम अलग-अलग नाम देते हैं। हमारे घर में सूफी परंपरा रही है। इस परंपरा में हमारे लिए धर्म बाधा नहीं है, बल्कि राह दिखाने वाली ताकत है। धर्म यह भी बताता है कि हमारी परंपरा में मानवीयता ही एक मात्र धर्म है। मैं इसी विचारधारा को अपना अध्यात्म मानता हूं।

यह मेरा विश्वास भी है। मैं इस बात से भी इंकार नहीं करता कि गॉड है। उन्हें हम देखें न देखें, महसूस करें या न करें, वह तो हर जगह हैं। मैं ये मानता हूं कि वह एक ऊर्जा के रूप में है और उस ऊर्जा को हम ध्वनि के माध्यम से महसूस कर सकते हैं। मैं मानता हूं कि उस ऊर्जा को देखने का माध्यम गुरु है। वही हमें उस एनर्जी तक पहुंचा सकते हैं, पहुंचने का रास्ता बता सकते हैं।

मेरे गुरु मेरे पिताजी हैं, जहां से मैंने संस्कार और संतूर के साथ-साथ सूफी संगीत का ज्ञान पाया है। संगीत के माध्यम से ही मैं आज ऊपर वाली परम सत्ता को महसूस कर पाता हूं। कुछ लोग मेडिटेशन करते हैं, ध्यान लगाते हैं। मैं अपने संतूर के संगीत की सहायता से ही मेडिटेशन कर पाता हूं। मेरा संतूर मुझे मेडिटेशन की अवस्था में जाने में सहयोग करता है, जहां पहुंचकर मुझे बेहद शांति और संतोष की प्राप्ति होती है। वैसे मुझे मंदिर-मस्जिद या गुरुद्वारे जैसे पूजा के विशेष स्थलों पर भी जाने में कोई परहेज नहीं है, क्योंकि वे हमारी प्राचीन परंपराओं का अहम हिस्सा हैं।

मैंने इस उम्र में ही काफी अवॉर्ड पा लिए हैं। सरकारी अवॉर्ड आमतौर पर 50 की उम्र के बाद मिलते हैं, लेकिन मुझे ऐसे कई अवार्ड 30-31 की उम्र तक ही मिल चुके हैं, जो मुझे माता-पिता के आशीर्वाद और ऊपर वाले की इच्छा से मिले हैं। उनके ही आशीर्वाद से मेरे संगीत में थोड़ा दम आ पाया। अगर मेरे संगीत में बिल्कुल भी दम नहीं होता तो शायद ये सम्मान नहीं मिल पाते। संगीत में मुझे वह बात दिखी है जो ईश्वर की निकटता महसूस कराती है। लेकिन सिर्फ मेडिटेशन से सारी बातें नहीं बन जातीं। हमें अपना-अपना काम भी करना होता है, जिसके लिए ऊपर वाले ने हमें चुना है। अपने काम को बेहतर तरीके से करके परम संतुष्टि तो मिलती ही है।

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