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तब जिंदगी जैसे ठहर-सी गई थी

तब जिंदगी जैसे ठहर-सी गई थी

वे स्टार थे। चारों तरफ उनका बोलबाला था। तभी अचानक 2003 मे मुंबई में ब्लास्ट हुए। पुलिसिया छानबीन में उनके घर से अवैध हथियार मिल गया। लगा जिंदगी ठहर जाएगी।

ये हैं संजू बाबा यानी संजय दत्त। फिल्म स्टार के रूप में इनका जवाब नहीं है। सन 1981 में हीरो के रूप में रॉकी फिल्म से सिने दर्शकों के बीच आए। 1986 में प्रदर्शित राजेन्द्र कुमार की फिल्म नाम से वे रातोरात स्टार हो गए। ‘थानेदार’, ‘साजन’, ‘खलनायक’ जैसी फिल्मों से वे गिने-चुने स्टारों की लिस्ट में शामिल हो गए, लेकिन देखते-देखते मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा।
वर्ष 1993 में एक तरफ ‘खलनायक’ प्रदर्शित हुई, दूसरी तरफ पुलिस उन्हें मुंबई ब्लास्ट के खलनायकों में शामिल करने के अभियान में जुट चुकी थी। वे टाडा (टेरोरिस्ट एंड डिसरप्टिव एक्टिविटी एक्ट) की चपेट में आ फंसे थे। उनके यहां से अवैध हथियार बरामद होने के कारण उन्हें टाडा के तहत गिरफ्तार कर लिया गया। इसी समय उनकी घरेलू जिंदगी भी मुश्किलों से भरी थी। पत्नी ऋचा शर्मा कैंसर से जूझ रही थीं। एक तरफ जेल का अंधेरा था, दूसरी ओर फिल्मों का दबाव।

सन 1993 से 1998 तक ‘गुमराह’, ‘जमाने से क्या डरना’, ‘आंदोलन’, ‘नमक’, ‘सनम’, ‘विजेता’, ‘दस’, ‘दुश्मन’ जैसी अनेक फिल्में आईं और चली गईं। वे महीनों जेल में रहने के बाद अदालत के सामने अपनी बेगुनाही की गुहार लगाते रहे। पिता सुनील दत्त उनकी बेगुनाही के सबूत प्रस्तुत करने में लगे थे, निर्माता अपनी फिल्मों के प्रदर्शन को लेकर परेशान थे कि पता नहीं, संजू बाबा वाली फिल्में उन्हें डुबाएंगी या पार लगाएंगी। आखिरकार संजू बाबा रिहा हुए और फिल्में भी रिलीज हुईं। तमाम बुरे कयासों के बीच 1999 में वे ‘वास्तव’ में ऐसे चले कि बेहतर अभिनय के लिए बेस्ट एक्टर का फिल्म फेयर अवॉर्ड भी मिल गया। उम्मीद की किरण उनके जीवन में दिख चुकी थी। सफल फिल्मों का सिलसिला शुरू हो चुका था।

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