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जानलेवा बनती जा रही धूल

शुद्ध पानी चाहिए तो आप बंद बोतल खरीद सकते हैं। लेकिन शुद्ध हवा कहां खरीदेंगे? यह प्रश्न कुछ अजीब लग सकता है। परंतु शहर का वायुमंडल जिस गति से प्रदूषित हो रहा है, उस मुताबिक यह स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

शहर के वायुमंडल में सिर्फ सूक्ष्म धूलकण की मात्रा पिछले पांच सालों के दौरान 40 प्रतिशत बढ़ गई है। इसके अलावा नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन डॉइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड समेत अन्य हानिकारक गैसों की मात्रा में भी बढ़ोत्तरी हुई है। परंतु पटना में वायु को सबसे ज्यादा प्रदूषित करने वाला तत्व धूलकण ही है।

आरएसपीएम सबसे बड़ी चिंता बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2006-07 में आरएसपीएम की मात्रा प्रति घनमीटर 117 माइक्रो ग्राम थी, जो 2010-11 में बढ़कर प्रति घनमीटर 169 माइक्रो ग्राम हो गयी है। जबकि इसका स्टैण्र्ड 60 माइक्रो ग्राम प्रति घनमीटर है। पटना सिटी के इलाके में आरएसपीएम की मात्रा 1820 माइक्रो ग्राम तक पहुंच गई है। हालांकि परेशान करने वाले इन आंकड़ें के बीच एक अच्छी बात यह है कि पटना के वायुमंडल में सल्फर डॉइआक्साइड की मात्रा में काफी गिरावट आई है। 2010-11 में यह निर्धारित मानक 50 माइक्रो ग्राम प्रति घन मीटर की तुलना में महज 7.9 माइक्रोग्राम ही है। 2006-07 में सल्फर डॉयआक्साइड की मात्रा 10.3 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर थी। धूल के कारण सिलिकोसिस और फेफड़ा रोगपटना के वायुमंडल में जैसे-जैसे धूलकण की मात्रा बढ़ रही है, वैसे-वैसे सिलिकोसिस, अस्थमा समेत फेफड़े की अन्य बीमारियां लोगों को जकड़ती जा रही हैं।

कुछ समय पहले बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पीएमसीएच के डॉक्टरों के साथ मिलकर पटना शहर में लोगों के स्वास्थ्य पर पर्यावरण के असर का अध्ययन करके एक रिपोर्ट तैयार की है। इसके अनुसार, शहर में 21.3 फीसदी लोग अस्थमा से पीडिम्त हैं। 24 फीसदी बच्चों में कफ की समस्या है। 6-7 फीसदी लोगों को रोजाना सांस संबंधित तकलीफ होती है। डॉ. अजय कुमार के अनुसार, अस्थमा के मरीजों की संख्या बढ़ने में धूल सबसे प्रमुख कारक है।

पटना में श्वास संबंधित रोगियों में सालाना 15 प्रतिशत की दर से बढ़ाेतरी हो रही है। रोजाना यहां जितने मरीज आते हैं, उनमें 40 फीसदी मरीज सांस संबंधित बीमारियों के ही रहते हैं।डीजल इंजन से भी बड़ा खतरा डीजल से चलने वाले वाहन और जेनरेटर भी वायुमंडल में आरएसपीएम की मात्रा को काफी बढ़ाते हैं। इनसे निकलने वाले धुएं में कार्बन कण काफी मात्रा में मौजूद होते हैं, जो 10 माइक्रोन से छोटे होते हैं।

ये कार्बन कण धूल कणों के साथ मिलकर श्वास नली या फेफड़े में चले जाते हैं। बॉक्स में ....क्या है आरएसपीएम? आरएसपीएम यानी रेसपाइरेटेड सस्पेंडेड पार्टीकुलेट ऐसे तत्व हैं, जिनमें धूल कण के अलावा कार्बन के बारीक कण, धुआं, ऑर्गेनिक पदार्थ और अन्य हानिकारक तत्व शामिल होते हैं। ये दो तरह के होते हैं, पहला 10 माइक्रोन से ज्यादा और दूसरा 10 माइक्रोन से कम। 10 माइक्रोन से ज्यादा वाले धूल कण और अन्य तत्व मनुष्य की सांस नली में प्रवेश नहीं कर पातीं और यह किसी रूप में बाहर निकल जाती हैं। परंतु 10 माइक्रोन से कम वाले धूल कण सांस नलियों में प्रवेश कर फेफड़े समेत अन्य स्वास नलियों में बैठ जातीं हैं।

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