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पहले किसानों को संतुष्ट करें

भट्टा परासौल में तो सरकार की ज्यादती है। किसानों का जो निकले, उसे दे दो। ऐसी बातों का गोली से हल न निकले। इन बातों को तो बैठ के निबटाया जा सकता है। जो घटना हो गई, वह दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन अब सरकार और अधिकारी देखें कि निर्दोष किसानों पर कोई अत्याचार न हो। भट्टा परासौल की घटना गोली चलने की पहली घटना नहीं है, पिछले 20 साल में सैकड़ों जगह किसानों पर गोली-लाठी चल चुकी, पर समस्या वैसी की वैसी ही है। हमेशा किसान ही पिसा है। इस व्यवस्था को बदलना तो पड़ेगा ही।

ये बात सही है कि विकास के लिए खेती की जमीन का अधिग्रहण जरूरी है। चौड़ी सड़कें गाड़ियों के चलने के लिएचाहिए ही, लेकिन यह विकास किसानों की जमीन को औने-पौने दाम पर लेकर नहीं हो। जिसे जमीन लेनी हो, वह किसानों को जमीन के भाव से दो रुपये अधिक दे, तो कोई समस्या ही नहीं रहेगी। जब बराबर में जमीन का भाव अधिक है, तो किसान की जमीन कम दाम पर क्यों लेने की कोशिश करती है सरकार? किसान तो इसका विरोध करेगा ही। सरकार और जमीन लेने वाले लोग तो किसान की जमीन से बाद में कमाएंगे ही। फिर किसान के हक को क्यों मारते हैं? अब किसान औने-पौने दाम में अपनी जमीन नहीं देगा।

सरकार तो किसानों की जमीन पर सड़क बनाकर गाड़ी चलाने के नाम पर टोल वसूलती है। जब किसानों से ली जमीन पर आगे कमाई ही करनी है, तो फिर किसानों को घाटे में क्यों रखते हो भाई? किसान को तो केवल एक बार ही जमीन से मिलेगा, जबकि उसकी जमीन से सरकार और उद्योगपति सैंकड़ों साल तक कमाएंगे। इसलिए  किसान तो सड़क पर उतरकर विरोध करेगा ही।

जब जमीन का सही दाम मिल जाएगा, तो किसान या तो कहीं और जमीन ले लेगा या फिर कोई काम-धंधा कर लेगा। जब जमीन चली जाएगी, तो आगे अपने बाल-बच्चों के लिए भी तो कोई व्यवस्था करनी पड़ेगी। ये भूमि अधिग्रहण कानून अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ है। इसमें बदलाव हो, तभी ये झंझट दूर होंगे। बड़े-बड़े उद्योगपति सरकार से मिलकर किसानों की जमीन का अधिग्रहण जबरन पुलिस के डंडे के बल पर कर लेते हैं और उसे ज्यादा दाम पर बेच देते हैं, तो इससे किसानों में गुस्सा भड़केगा ही। इसलिए प्रदेश और देश की सरकार को इस पर गंभीरता से सोचना ही पड़ेगा।

भारतीय किसान यूनियन ने मार्च 1987 से किसानों की लड़ाई लड़नी शुरू की थी, उस समय राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री थे। उस समय किसानों की प्रमुख समस्या थी, उन्हें अपनी फसलों का उचित भाव न मिलना। उन्हें बिजली-पानी नहीं मिल रहा था। राजीव गांधी से तो किसानों की समस्याओं को लेकर बात नहीं हो पाई, लेकिन उनके बाद प्रधानमंत्री बने विश्वनाथ प्रताप सिंह से जरूर बात हुई थी।

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर तो सिसौली आकर किसानों की समस्या से स्वयं अवगत होकर गए थे। इसके बाद किसानों की समस्या को लेकर उस समय के प्रधानमंत्री नरसिंह राव से भी बात हुई। प्रधानमंत्री देवगौड़ा तो अपने मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ सिसौली आ गए थे। उनके बाद प्रधानमंत्री बने इंद्रकुमार गुजराल से भी पूरे देश के किसानों के प्रतिनिधियों की बातचीत हुई। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने, तो हमने उनसे मिलकर भी कुछ समस्याओं को उठाया था। अब पिछले काफी समय से देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी हैं। इनके कार्यकाल में ही किसानों की भूमि अधिग्रहण की समस्या सबसे ज्यादा आई है।

किसान यूनियन के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिलकर भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव का मामला भी रखा था। यह समस्या किसी एक प्रदेश की नहीं है, बल्कि पूरे देश के किसानों की है। पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण को लेकर हिंसा हुई थी, तभी सरकार को इस कानून में बदलाव के बारे में सोचना चाहिए था। गुजरात में, महाराष्ट्र में, सभी जगह किसानों की भूमि ली जा रही है। किसान करें भी तो क्या, वे अपनी जमीन लेने के विरोध में सड़क पर आकर प्रदर्शन ही कर सकते हैं। मगर सरकार इसका हल भी गोली से निकलना चाहती है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सारी बातों को जानते हैं। अब पता नहीं कब केंद्र सरकार सोचेगी और इस कानून में बदलाव करेगी?

पहले जब भाकियू का प्रतिनिधिमंडल केंद्र सरकार से वार्ता के लिए दिल्ली गया था, तो वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा ने आश्वासन दिया था कि एक समिति का गठन किया जाएगा, जिसमें राज्यों के मुख्यमंत्री भी रहेंगे। अभी तक आश्वासन ही मिला है, समिति का गठन नहीं हुआ है। सात मार्च को भाकियू का प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिला था, समस्याओं पर बात हुई थी और आश्वासन भी मिला था, लेकिन वह पूरा नहीं हो पाया। अब दोबारा प्रधानमंत्री से टाइम लेने का प्रयास करेंगे। समय मिला, तो फिर किसानों की समस्याओं को रखेंगे। समस्या उन्हें ही हल करनी है।

23 साल पहले जब बोट क्लब पर किसान उमड़े थे, तो उस समय राजीव गांधी से नहीं मिलने का हमारे मन में मलाल भी है। कांग्रेसियों ने राजीव गांधी से नहीं मिलने दिया था। हम उनसे उस समय मिलकर किसानों की समस्या के बारे में समझा देते, तो किसानों का बहुत लाभ हो जाता। किसानों की समस्या का हल तभी हो सकता है, जब प्रदेश और केंद्र की सरकार मिलकर सोचेंगी।

कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जो प्रदेश सरकार के स्तर से हल होंगी, जबकि कुछ समस्याएं ऐसी हैं, जो बिना केंद्र सरकार के हल हो नहीं सकतीं। इसलिए दोनों को मिलकर काम करना होगा। किसान तो परेशान हैं कि प्रदेश और केंद्र में अलग-अलग दलों की सरकार बन जाती है। जब उनमें आपस में ही विचार नहीं मिलते, तो वे किसानों के बारे में कैसे विचार करेंगी?

किसानों की समस्या का हल तो राजनीति से ऊपर उठकर ही हो सकेगा। हमारा कहना है कि देश का विकास तो हो, लेकिन किसानों को दबाकर, उनकी जमीन जबर्दस्ती लेकर न हो, बल्कि उन्हें संतुष्ट करके बाजार भाव से दो रुपये फालतू दाम देकर जमीन ली जाए।          
(ये लेखक के निजी विचार हैं) 

प्रस्तुति : अरविंद भारद्वाज

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