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कम नहीं हो रही है नेपाल की कटुता

विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की हाल ही में हुई नेपाल यात्रा से बड़ी उम्मीद थी कि वह भारत और नेपाल के रिश्तों को मजबूत करने के लिए पूरा प्रयास करेंगे, परंतु ऐसा कुछ हो नहीं सका। आज भी नेपाल में भारत विरोधी हवा बह रही है। कहा जाता है कि भारत के प्रति इतनी कटुता नेपाल में पहले कभी नहीं थी। कृष्णा ने माओवादी सुप्रीमो प्रचंड से बात की। प्रचंड ने अपनी भड़ास निकाली और कहा कि यदि नेपाली सेनाध्यक्ष रुकमांगद कटवाल के मामले में भारत ने कटवाल का साथ नहीं दिया होता, तो उनकी कुर्सी नहीं जाती।

दरअसल, प्रचंड का कहना था कि जिन माओवादी लड़ाकों ने सशस्त्र क्रांति करके नेपाल में राजशाही को समाप्त किया था, उनकी भर्ती नेपाल की राजकीय सेना में की जाए। पर कटवाल ने इसका विरोध किया और भारत ने उनके पक्ष का समर्थन यह कहकर किया कि यदि उन माओवादियों को सेना में शामिल किया गया, तो नेपाल में अराजकता छा जाएगी। लाचार होकर प्रचंड ने त्यागपत्र दे दिया था और तभी से वह और उनके समर्थक माओवादी नेपाल की सरकार के गठन में तथा प्रधानमंत्री के चयन में अड़ंगा लगाते रहे। अनेक झंझटों के बाद झलनाथ खनाल कुछ महीने पूर्व नेपाल के नए प्रधानमंत्री नियुक्त हुए। कहा जाता है कि उन्हें माओवादी नेता प्रचंड का पूरा समर्थन प्राप्त है।
 
नेपाल के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराने हैं, परंतु उनकी अनदेखी करके नेपाल में भारत विरोधी लहर को वहां की सरकार हवा दे रही है। भारत के राजदूत जिस किसी समारोह में जाते हैं, उन्हें अपमानित किया जाता है और इस मामले में नेपाल की सरकार चुप बैठी है। कृष्णा के नेपाल दौरे के ठीक पहले, चीन के सेनाध्यक्ष चनपिंगते नेपाल आए थे और दोनों देशों ने सैनिक समझौता करने पर विचार किया। यह सैनिक समझौता किसके खिलाफ है? जाहिर है, यह भारत के खिलाफ है।

गत 60 वर्षों से भारत ही नेपाल को उसकी आवश्यकतानुसार अस्त्र-शस्त्र मुहैया करता रहा है तथा नेपाली सैनिकों को ट्रेनिंग भी देता रहा है। 1988 में नेपाल के तत्कालीन महाराज वीरेंद्र ने इस समझौते के नवीनीकरण से मना कर दिया था। उनका कहना था कि नेपाल जहां से चाहेगा, वहां से अस्त्र-शस्त्र खरीदेगा। 

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी अच्छी तरह समझ गए कि नेपाल पूरी तरह चीन के चंगुल में फंसता जा रहा है। उन्होंने महाराज को राय बदलने के लिए मजबूर कर दिया। 

अब जब चीन के सेनाध्यक्ष ने नेपाल के साथ सैनिक समझौते का प्रस्ताव किया है, तो भारत के विदेश मंत्री कृष्णा के लिए उचित था कि वह इसका विरोध करते। इससे यह संदेश गया है कि चीन तिब्बत की तरह नेपाल को भी हड़पना चाह रहा है और भारत मूकदर्शक बना हुआ है। नेपाल की नदियां हर वर्ष उत्तर बिहार में कहर बरपाती हैं, लेकिन इस बार इन पर भी कोई बात नहीं हुई।

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