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हंसी मजाक ही तो है

उनकी टीम उदास थी। एक प्रोजेक्ट बीच में ही छोड़ना पड़ा था। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी टीम को कैसे संभालें? अचानक उन्होंने हंसी मजाक शुरू कर दिया। धीरे-धीरे पूरा माहौल ही बदल गया।

बेहतर हंसी मजाक हमारे गिरे हुए मूड को उठा देता है। डॉ. जूडी ग्रुएन मानती हैं कि हंसना-हंसाना हमें भरोसा दिलाता है कि हम अकेले नहीं हैं। अच्छा हंसी मजाक हमारे दोस्तों को बढ़ा देता है। और बुरा हंसी मजाक हमारे दोस्तों को कम कर सकता है। ह्यूमरिस्ट जूडी ने गजब की किताब लिखी है, ‘द वीमेन्स डेली आयरनी सप्लीमेंट।’
 
उन लोगों का क्या, जो हंसते-हंसाते भी राशन में हैं। जिसे जूडी ‘ह्यूमर डेफिसिएंसी सिंड्रोम’ कहती हैं। क्या इसका कोई इलाज है? उस पर जरूर रिसर्च होनी चाहिए। तनाव दूर करने के लिए मजाक एक तरह का रैपिड फायर है। अब काम करते हुए कोई रुदाली मूड में है। अगर उसे एक मजाक का नश्तर लगा दिया जाए, तो पूरा मूड ही बदल जाएगा।
 
हंसी मजाक कमाल कर सकता है। वह एक किस्म की दवा है। अच्छा हंसी मजाक हमारी परेशानी को दूर कर सकता है। बुरा हंसी मजाक हमारे अच्छे-भले माहौल को बर्बाद कर सकता है। आखिर हम अपने माहौल को बर्बाद तो करना नहीं चाहेंगे न।
 
हंसते-हंसाते हुए एक बात हर हाल में ध्यान रखनी चाहिए कि उससे किसी को ठेस न पहुंचे। अगर ठेस लग गई, तो मजाक का पूरा विचार ही चौपट हो जाएगा। मजाक ठेस लगाने के लिए होता ही नहीं है। वह तो मरहम लगाने का काम करता है। इसीलिए ठेस पहुंचाने वाल मजाक से चीजें बिगड़ती हैं। वह मजाक तोड़ता है। लेकिन मरहम लगाने वाला मजाक हमें जोड़ता है। हमें अपने से ही सवाल पूछना चाहिए कि हम जोड़ना चाहते हैं या  तोड़ना। उसका जवाब तय होने के बाद ही मजाक के लिए आगे बढ़ना चाहिए। तो क्या सोचा आपने?         

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