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किसकी जमीन

उत्तर प्रदेश में चल रहे किसान आंदोलन ने फिर दिखाया है कि विकास कार्यों के लिए जमीन के अधिग्रहण का मसला कितना नाजुक है। इस आंदोलन को सारे देश में हो रहे ऐसे आंदोलनों की एक कड़ी के रूप में देखा जा सकता है, हालांकि इस इलाके में ऐसे आंदोलन का भड़क उठना आश्चर्यजनक लगता है। ऐसा लग रहा था कि उत्तर प्रदेश सरकार की नई जमीन अधिग्रहण नीति से किसान संतुष्ट हैं, बल्कि बाकी देश में इस नीति को आदर्श की तरह देखा जा रहा था। लेकिन आंदोलन जितनी तेजी से उग्र हुआ, उससे लग रहा है कि इस नीति के बावजूद कई सवाल अनसुलझे रह गए हैं।

इस आंदोलन को इतना उग्र और हिंसक बनाने में किसान नेताओं की गलती कितनी है और प्रशासन की नासमङी कितनी, ये सवाल छोड़ भी दिए जाएं, तो भी यह कहना होगा कि ऐसा आंदोलन, जिसमें चार लोगों की मौत हुई और कई गंभीर रूप से जख्मी हुए, उसमें दोनों पक्षों की ओर से ज्यादा समझदारी दिखानी चाहिए थी। चूंकि देश में बड़े पैमाने पर विकास कार्य चल रहे हैं और इसके लिए जमीन का अधिग्रहण भी हो रहा है, इसलिए इस तरह की और घटनाएं न हों, तो अच्छा।

यह साफ है कि विकास कार्यो के लिए जमीन का अधिग्रहण जरूरी है और इससे पैदा होने वाली पेचीदगियों से निपटने का कोई सरल नुस्खा नहीं है, लेकिन अगर समझबूझ कर, पारदर्शिता के साथ यह प्रक्रिया चलाई जाए, तो कुछ समाधान निकल सकता है, जो दूसरी जगहों के लिए नजीर बन सकता है। एक बात यहां बताना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश के इस इलाके में किसान जमीन के अधिग्रहण के खिलाफ नहीं हैं, उनका मानना यह है कि सरकार उनसे कम दामों में जमीन लेकर निर्माण उद्योग को दे रही है और मुनाफा कमा रही है। इसका एक इलाज यह माना गया है कि किसानों से सीधे डेवलपर्स जमीन खरीदें, लेकिन इसमें भी कई पेच हैं। इसमें भी तरह-तरह के दलालों और उनके हथकंडों की बड़ी भूमिका हो जाती है।

महत्वपूर्ण बात यह है अगर किसानों को यह लगे कि उन्हें अपनी जमीन की सही कीमत मिल रही है और उन्हें आर्थिक सुरक्षा मिलती रहेगी, तो वे आम तौर पर जमीन अधिग्रहण के खिलाफ नहीं होते। असली समस्या जमीन की कीमत की है, कोई भी कीमत किसी को किसी वक्त ज्यादा या कम लग सकती है। इसकी वजह यह है कि हमारे देश में जमीन की कीमत तय करने का कोई पारदर्शी तरीका नहीं है। जमीन के धंधे में काले पैसे और अटकलबाजी की इतनी बड़ी भूमिका है कि वास्तविक बाजार मूल्य तय करना तकरीबन असंभव है।

दिक्कत हमारे देश में जमीन के कारोबार में पुराने ढंग के कानून और भ्रष्टाचार की है। अगर जमीन से संबंधित कानून ज्यादा आधुनिक हों, तो ज्यादा जमीन विकास के लिए उपलब्ध होगी और जमीन के कारोबार में काले धन और सट्टेबाजी की जगह घटेगी। ऐसे में जमीन की कीमत तय करना भी ज्यादा आसान होगा और जमीन के मालिकों को यह शक भी नहीं होगा कि उनके साथ अन्याय या धोखाधड़ी हुई है।

सरकार को यह भी समझना चाहिए कि जमीन किसान के लिए सिर्फ रोजी-रोटी नहीं, सुरक्षा की गारंटी भी है, इसलिए इस सुरक्षा का विकल्प भी उतना ही मजबूत होना चाहिए। अगर यह प्रक्रिया पारदर्शी हुई और किसानों को विश्वास में लेकर हुई, तो शायद उस तरह की समस्या से बचा जा सकेगा, जैसी समस्या ग्रेटर नोएडा में खड़ी हुई है। जमीन के अधिग्रहण का मसला जमीन को खेतिहर युग से औद्यौगिक युग में लाने का नहीं हैं, दो बराबरी के भागीदारों में लेन देन का है, यह बात अगर समझी जाए, तो कई दिक्कतें हल हो सकती हैं।

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