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उपभोक्ताओं से धोखा

मोबाइल ग्राहकों की शिकायतें सुनने में कस्टमर केयर वाले बहरों जैसा व्यवहार करते हैं। सुबह, दोपहर, शाम, कभी भी फोन लगाइए, फोन नहीं पकड़ेगा। सवाल यह है कि जिस तत्परता के साथ कंपनियां मोबाइल-कनेक्शन देती हैं, उसी तत्परता से ग्राहकों की शिकायतें क्यों नहीं सुनतीं? यह तो सीधे-सीधे उपभोक्ताओं के साथ धोखा है।
विकास कुमार, दरभंगा, बिहार

बिहार में बिजली संकट
बिहार में बिजली संकट गंभीर रूप ले चुका है। हालात ऐसे हो गए हैं कि बिजली से संबंधित सभी कारोबार लगभग ठप-से पड़ गए हैं। यहां तक के मोबाइल चार्ज करने के लिए भी जेनरेटरों का सहारा लेना पड़ रहा है। केंद्र सरकार की उपेक्षा और राज्य सरकार की धीमी चाल से आम जनता इस गरमी में परेशान है और वह सड़कों पर उतरने के बारे में गंभीरता से सोच रही है। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस संकट से निपटने के लिए भूटान की यात्रा की है। अब देखना यह कि बिजली संकट कब तक दूर हो पाता है।
दीपक दत्त

भ्रष्टाचार से जंग
हमारे देश में भ्रष्टाचार एक जटिल समस्या बन गई है। समाजसेवी अन्ना हजारे के समर्थन में हजारों लोगों ने भूख हड़ताल की, परंतु भ्रष्टाचारियों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। पंजाब में एक विधायक की दलाली का किस्सा अभी बिल्कुल ताजा है। पहले अंग्रेजों ने हमारे देश को लूटा और अब राजनेता इसमें रिकॉर्ड बनाते जा रहे हैं। इसलिए अब ईमानदार लोगों को हर स्तर पर सक्रिय होना पड़ेगा।
कुमार सौरभ

नंगली डेरी की दुर्दशा
अगर आपको दिल्ली में समस्याओं के अंबार को देखना है, तो नंगली डेरी में आपका स्वागत है। चारों ओर कूड़े और गंदगी का आलम है। मच्छरों का आतंक अपने चरम पर है। नंगली डेरी के बस स्टैंड को ग्रामीण सेवा वाले घेरकर रखते हैं, जिससे  सड़क पार करना एक जंग जीतने जैसा हो जाता है। डेरी के व्यापारी अपने पशुओं का चारा (भूसा) मुख्य सड़क पर उतारते हैं, जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित स्कूल जाने वाले बच्चे, बीमार व बूढ़े लोग होते हैं। नंगली डेरी स्टैंड से लेकर घासीपुरा और उसके आगे प्रेम विहार तक बिजली के खंबे तो लगे हैं, किंतु उन पर वर्षों से लगी स्ट्रीट लाइटें नहीं जलतीं। ऐसे में, पॉकेटमारों की चांदी हो जाती है। अब आगे क्या बताएं, यहां का एक बार दौरा करके तो देखिए, देश की राजधानी में होने का सारा नशा उतर जाएगा।
धर्मेद्र कुमार, नंगली डेरी, नजफगढ़, नई दिल्ली

खुदकुशी करती महिलाएं
पिछले कुछ दिनों से महिलाओं की आत्महत्याओं के बढ़ते समाचार लगातार पढ़ने और देखने को मिल रहे हैं। आश्चर्य की बात है कि माताओं ने अपने नन्हे-मुन्नों के साथ मौत को गले लगाया। साफ है, उन पर किसी बात का भारी दबाव रहा होगा, जिसे वे ङोल नहीं पाईं। सोचने वाली बात यह है कि ऐसी घटनाएं अब आधुनिक और आत्मनिर्भर कहलाने वाले वर्ग में घट रही हैं। तो क्या पढ़ाई-लिखाई और आत्मनिर्भरता हमें यही सब सिखाती है कि हम लालच और झूठे स्वाभिमान के लिए दूसरे प्राणी को इतना मजबूर कर दें कि उसके पास मौत को गले लगाने के अलावा कोई चारा ही न रहे? हमें मिलकर इसके कारणों का पता लगाना होगा और उन्हें जड़-मूल से समाप्त करने के लिए प्रयत्न करना होगा, ताकि इन दुखद घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
सतीश त्यागी ‘काकड़ा’, गाजियाबाद

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