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मेहनत करने वालों की हार नहीं होती

मेहनत करने वालों की हार नहीं होती

सुनने की शक्ति बचपन में ही खो चुके मणि राम शर्मा को एक नहीं, दो बार आईएएस में सफलता के बावजूद पदभार संभालने से मना कर दिया गया। पर तीसरी बार सफलता उन्हें इंकार नहीं कर सकी। आइए जानते हैं, मणि राम शर्मा के राजस्थान में क्लर्क से लेकर मणिपुर में असिस्टेंट कमिश्नर बनने तक की कहानी रुचि से।

कहते हैं कि हिम्मत करने वाले की कभी हार नहीं होती और कुछ ऐसा ही राजस्थान के अलवर जिले के मणि राम शर्मा के साथ भी हुआ। आनुवंशिक रोग की वजह से मणि राम बचपन में ही सुनने की शक्ति खो बैठे। गरीब और अशिक्षित परिवार से होने के कारण उनका बचपन कठिनाइयों से घिरा रहा। बावजूद इसके उन्होंने मेहनत की और तीन बार भारतीय प्रशासिनक सेवा आईएएस में सफलता हासिल करने के बाद आज वे मणिपुर में डाक एवं दूरसंचार वित्तीय एवं लेखा सेवा के लिए असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में कार्य कर रहे हैं। अपने बचपन के बारे में मणि राम का कहना है, ‘परिवार में कोई पढ़ा-लिखा नहीं है। माता-पिता मजदूरी करते थे। बचपन में मैं सरकारी स्कूल में जाया करता था। 12वीं तक अपनी पढ़ाई करने के बाद मैं एलडीसी यानी क्लर्क बन गया।’

एक क्लर्क से आईएएस बनने का सफर उनके लिए कभी आसान नहीं था। देश की सेवा के लिए जो जितनी बड़ी से बड़ी परीक्षा हो सकती थी, मणि राम ने पास कर के दिखाई। नेशनल एजुकेशनल टेस्ट, स्टेट लेवल एजुकेशनल टेस्ट के अलावा मणि राम शर्मा ने राजस्थान प्रशासनिक सेवा की परीक्षा भी पास की। शिक्षा के मामले में जहां मणि राम आम छात्रों के मुकाबले कई गुणा आगे थे, वहीं नौकरी के मामले में किस्मत ने उनका साथ नहीं दिया। आम आदमी के लिए जहां भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस की परीक्षा को एक बार पास करना भी मुश्किल होता है, वहीं मणि राम को दो बार इसमें पास होने के बावजूद सिर्फ इसलिए किसी विभाग में नहीं रखा गया, क्योंकि उनकी सुनने की शक्ति 100 प्रतिशत खत्म है। आईएएस के नियमों के अनुसार आंशिक तौर पर बधिर लोगों को ही नियुक्ति मिल सकती है।

कई बार सफलता के इतने करीब पहुंच कर असफल होने के अपने अनुभव के बारे में मणि राम का कहना है, ‘मेरे लिए यह बेहद-बेहद निराशाजनक था। मैं कोई साधु महाराज नहीं था, जो हर बार इतनी मेहनत करने के बार रिजेक्ट कर दिया जाऊं और मैं उसे स्वीकार कर लूं। मैं काफी परेशान हो जाता था। लेकिन मुझे लगता है कि हर बार नाकामयाब होने के कारण आज मैं काफी मजबूत बन गया हूं।’

अपनी सफलता का सेहरा मणि राम शर्मा भगवान को पहनाते हैं। उनका कहना है, ‘इतने मुश्किल समय में भी मेरी शिक्षा कैसे पूरी हुई, यह तो भगवान ही जानता है। हां, कड़ी मेहनत, दृढ़ निश्चय और लगन के साथ सभी चुनौतियां पार की जा सकती हैं।’ मणि राम की सफलता की अपनी परिभाषा है। वे कहते हैं कि जब आप दूसरों के लिए काम करते हैं तो आप खुद ब खुद सफल होते हैं। मेरे सगे-संबंधियों में 35 ऐसे लोग हैं, जो सुन नहीं सकते। मैं जानता हूं कि मैं ही एक व्यक्ति हूं, जो उनकी मदद कर सकता है। मैं उन लोगों के लिए कुछ कर सकूं, बस मेरी सफलता इसी में है। परिवार की अगली पीढ़ी के लिए मुझे जेनेटिक्स इंजीनियरिंग की जरूरत है। साथ ही उनकी मदद के लिए मुझे स्टेम सेल थेरेपी या कोक्लीयर इंप्लांट की जरूरत है, जिसका खर्च लगभग 8 लाख रुपये है। इसलिए मेरे सामने एक लंबा रास्ता तय करने के लिए बचा है।

मणि राम शर्मा कभी नकारात्मक सोच नहीं रखते। उनका युवाओं से कहना है, ‘हमेशा अपनी जिंदगी एक मिशन के साथ जीएं।

हमेशा गरीब समाज के कल्याण के बारे में सोचें। अगर ऐसा होता है तो मेहनत और किस्मत खुद-ब-खुद आपके साथ होंगे।’ इलाज के बाद आज मणि राम शर्मा काफी साफ सुन और बोल सकते हैं और वे कुछ ऐसा ही चमत्कार अपने परिवार के बाकी लोगों के साथ भी होते हुए देखना चाहते हैं।

फैक्ट फाइल

जन्म तिथि: 15 मार्च, 1975

पद: असिस्टेंट कमिश्नर, (डाक एवं दूरसंचार वित्तीय एवं लेखा सेवा) चुराचंदपुर जिला, मणिपुर
शिक्षा: स्कूली शिक्षा राजस्थान से, बीए ऑनर्स राजस्थान विश्वविद्यालय, एमए और पीएचडी
सफलता: नेशनल एजुकेशनल टेस्ट विद जेआरएफ और स्लेट
राजस्थान प्रशासनिक सेवा (1999) और (2003)
भारतीय प्रशासनिक सेवा (2004, 2005, 2008)
सम्मान: लाल बहादुर शास्त्री नेशनल एकेडमी फॉर एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी की ओर से गोल्डन जुबली अवॉर्ड

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