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ना, ये सामूहिक विवाह नही है। ये साथ-साथ विवाह है। इसके मूल में कोई मजबूरी नहीं बल्कि कुछ जज्बात, कुछ अपनापन और बेबात की फिजूलखर्ची पर लगाम लगाना है। सामूहिक विवाह की खबरें हम अक्सर सुनते हैं। अक्सर ये किसी समर्थ संस्था या सक्षम लोगों-नेताओं की पहल पर सामने आते हैं। लेकिन इस साथ-साथ विवाह में यह नयी पहल है, नया संदेश है।

यह संदेश छोटे से शहर संतकबीरनगर के छोटे से गांव छपिया छितौनी के पांच श्रमिक परिवारों ने दिया है। इन्होंने बताया है कि तथाकथित झूठी सामाजिक ‘मान मर्यादा’ और ‘प्रतिष्ठा’ के फेर में न पड़कर अपनी सीमाओं को देखा जाए तो राह आसान हो सकती है।

समझदारी की यह राह दिखाने वाले छपिया गांव के इन पांच श्रमिक परिवारों का मानना है यदि इस तरह से फैसले लिए जाएं तो अनचाहे बोझ से राहत भी मिलेगी और बचत भी होगी। बहुतों को बेटी की शादी के लिए कर्ज भी नहीं लेना पड़ेगा। लेना भी पड़ा तो आम तौर पर होने वाले विवाह खर्चो की तुलना में काफी कम होगा।

छपिया छितौनी गांव की चार बेटियों और एक बेटे की शादी 13 मई को गांव के ही प्राइमरी स्कूल परिसर में एक मण्डप के नीचे होगी। चारों बेटियों के लिए बारातें अलग-अलग गांवों से आएंगी। गांव के लड़के की शादी भी गांव में ही होगी। कन्या पक्ष अपने कुछ लोगों को ले कर छपिया आ जाएगा। पांचों विवाह एक ही पण्डित जी कराएंगे। एक बारात से नौटंकी आ रही है। सबका मनोरंजन उसी से होगा। टेंट, सजावट, नाश्ता, खाने-पीने और बाकी काम में जो खर्च आएगा, पांचों मिल-जुल कर बांट लेंगे।

अगर ये शादियां अलग-अलग तारीखों पर होतीं तो हर बार बाराती भी इतने आते और हर बार घरातियों की संख्या भी इतनी ही रहती। मतलब खर्चा पांच गुना बढ़ जाता। इस नई समझदारी भरी तरकीब से अब एक ही दिन सीमित संसाधनों, सीमित श्रम और कुल आने वाले खर्च के पांचवें हिस्से में ही स्वागत-सत्कार और खिलाना-पिलाना सब सम्पन्न हो जाएगा।

एक अलग तरह का सुख भी मिलेगा।समझदारी का यह विचार कौंधा आपस में बातचीत में। शिवपूजन, रामकौल, जोगीराम और घनश्याम को अपनी बेटी की शादी करनी थी तो राममिलन को अपने बेटे की। पांचों ने सोचा कि अगर सारी शादियां एक ही दिन और एक ही स्थान पर करा दी जाएं तो एक तो यह यादगार हो जाएगी दूसरे भारी बचत भी होगी। पांचों ने दूसरे पक्ष से बात की और बात बन गई।

राममिलन के बेटे का मामला अलग पड़ रहा था सो तय हुआ कि लड़की पक्ष को गांव में बुला लिया जाए। वह भी राजी हो गया।जिन लोगों ने यह समझदारी दिखाई है वे न तो विद्वान हैं न अर्थशास्त्री या चिंतक।

बहुत साधारण से लोग हैं। नाम मात्र के पढ़े-लिखे। बस, सुख-दु:ख साझा करते रहते हैं। इनमें से कई को शादी के लिए कर्ज लेना पड़ता मगर अब बिना कर्ज के काम चल जाएगा। चूँकि उन्हें अहसास हो गया है कि वे कुछ अनूठा करने जा रहे हैं इसलिए शादी का कार्ड बहुत शानदार बनवाया गया है। उनकी इस सोच की चारों ओर प्रशंसा हो रही है। सारा गांव इस अनूठे समारोह में बढ़-चढ़ कर सहयोग करने जा रहा हैं।

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  • Web Title:सामूहिक नहीं, ये साथ-साथ विवाह है