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गाजा पट्टी पर गाज

अगर ईंट का जवाब पत्थर से देने का रुख अपनाया जा रहा हो तो टकराव बढ़ने की आशंका प्रकट करना निराधार नहीं कहा जा सकता। फलस्तीन और इजरायल के बीच छह माह तक चले संघर्षविराम को खत्म करने की पहली भड़काऊ कार्रवाई हमास की तरफ से हुई। लेकिन, यह इतनी बड़ी नहीं थी कि उसका मुंहतोड़ जवाब इजरायल एक भीषण हमले के रूप में देता, जिसमें लगभग 300 लोग मौत के शिकार हुए। हमास अपने कट्टरपंथी रुख के लिए कुख्यात है। उसने इजरायली इलाके में पहली चिंगारी के रूप में रॉकेट एवं मोर्टारों से हमला कर गैर-ािम्मेदाराना कदम का परिचय दिया। दुर्भाग्य यह है कि फलस्तीनी लोगों का नेतृत्व अब यासर अराफात जसे मध्यमार्गी या उदारपंथी नेताओं के हाथ में नहीं रहा और हमास के उग्रपंथी नेता हावी हो गए हैं। इजरायल सरकार ने भी हमास के हमले के प्रतिकार में एक सोची-समझी रणनीति के तहत ही मौजूदा समय और राजनीतिक गणनाएं ध्यान में रखकर भयावह हमला किया प्रतीत होता है। आगामी फरवरी माह में वहां संसदीय चुनाव होने वाले हैं और लिकुड़ पार्टी नीत सरकार चुनाव से पूर्व आक्रामक तेवर अपनाकर सत्ता पर फिर काबिज होना चाहती है। दूसरी बात, अमेरिका में आगामी 20 जनवरी को सत्ता परिवर्तन होगा, जहां रिपब्लिकन पार्टी के बजाय अब डेमोक्रेटिक पार्टी के बराक ओबामा शासन की बागड़ोर संभालेंगे। रिपब्लिकन प्रशासन इजरायल को बढ़-चढ़कर समर्थन-सहायता देता रहा है और इस समय उसके सत्ता में रहते हुए इजरायल को फलस्तीन पर हमला करना आसान लगा, क्योंकि ओबामा ने अपनी पश्चिम एशिया नीति के पूर पत्ते अभी नहीं खोले हैं। इजरायल की यह सोच भी रही होगी कि हमास की कारिस्तानी के बहाने भीषण हमला कर ओबामा पर पहले से उसका साथ देने के लिए दबाव बना दिया जाए। मुद्दे की बात यह है कि इन हमलों के दूरगामी दुष्परिणाम सामने आएंगे- पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने से न केवल कच्चे तेल की सप्लाई पर आशंका के बादल छाएंगे और उनके मूल्य में वृद्धि होगी, बल्कि राख के नीचे जो आग दबी हुई थी, वह फिर सतह पर आकर झुलसाने लगेगी। फलस्तीन विवाद काफी पुराना है और उसका निपटारा युद्ध या ताकत के बल पर नहीं, बल्कि शांति वार्ता के जरिए ही संभव है। जब तक दोनों पक्ष यह अहसास नहीं करते, तब तक शांति एक मृग-मरीचिका ही बनी रहेगी।

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