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अयोध्या मामले के नए पेच

जो लोग यह मानते हैं कि अदालतें अपनी पहल पर पंच की भूमिका निभा सकती हैं, उन्हें सुप्रीम कोर्ट के रुख से निराशा हुई होगी। सर्वोच्च न्यायालय ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ के उस फैसले पर रोक लगा दी है, जिसमें अयोध्या में राम जन्मभूमि के विवादित परिसर को तीन हिस्सों में बांटने और उसे निर्मोही अखाड़े, हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बराबर-बराबर देने का आदेश दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय के एक हिस्से पर आश्चर्य व्यक्त किया है। न्यायमूर्ति आफताब आलम तथा न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा के खंडपीठ ने कहा कि जब मुकदमे के किसी पक्षकार ने विवादित स्थल के बंटवारे की मांग नहीं की, तो अदालत ने उसके बंटवारे का आदेश कैसे दे दिया? अदालती फैसले और समझौता वार्ता में बुनियादी अंतर होता है। अदालती फैसले की बुनियाद, मुकदमों के तथ्यों और सुबूतों पर टिकी होती है। फैसला देते समय कोई भी न्यायाधीश केवल तथ्यों और सुबूतों के प्रति जबावदेह होता है। उसे इस बात की चिंता नहीं होनी चाहिए कि लोग इसके बारे में क्या सोचेंगे?

न्यायाधीश सामाजिक लोकप्रियता की कसौटी से मुक्त होता है और उसका यही मानसिक प्रशिक्षण उसकी ताकत होती है। समझौता तथा सुलह-सफाई की स्थिति इससे बिल्कुल अलग होती है। इसमें कानूनी गुण-दोष हाशिये पर चला जाता है। पक्षकारों की स्वीकार्यता उसमें महत्वपूर्ण हो जाती है। सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा आदेश इसी व्यावहारिक प्रश्न की अभिव्यक्तिमात्र है।

राम जन्मभूमि के विवादित स्थल के मालिकाना हक का विवाद बहुत पुराना है। इसकी औपचारिक शुरुआत करीब 60 वर्ष पहले 16 जनवरी, 1950 को तब हुई थी, जब हिंदू महासभा की ओर से गोपाल सिंह विशारद और दिगंबर अखाड़ा की ओर से रामचंद्र दास ने उसे राम जन्मभूमि बताते हुए उस पर मालिकाना हक जताया। सुन्नी वक्फ बोर्ड और निर्मोही अखाड़े के अपने-अपने दावे थे और उन सभी ने उस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताया था। उसमें अदालत ने कई वाद बिंदु बनाए, जिसका उसे निस्तारण करना था। इनमें से एक महत्वपूर्ण बिंदु मालिकाना हक को लेकर था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के लखनऊ पीठ ने बीते 13 सितंबर, 2010 को इस विषय पर अपना फैसला दिया था। फैसले में सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया था कि विवादित स्थल लंबे समय से भगवान राम की जन्मभूमि के रूप में माना जाता रहा है। किंतु उसके मालिकाना हक को लेकर तीन न्यायाधीशों के पीठ में मतभेद थे। न्यायमूर्ति एसयू खान तथा न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने अपने निर्णय में कहा कि 2.77 एकड़ के विवादित स्थल को तीन भागों में बांट दिया जाना चाहिए, जिसे निर्मोही अखाड़ा, हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बांट दिया जाना चाहिए। तीसरे न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीबी शर्मा ने अपने निर्णय में कहा कि विवादित स्थल राम जन्मभूमि है और उस पर हिंदुओं का एकाधिकार है। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस फैसले को चुनौती दी थी। उसका कहना था कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। उसका यह तर्क भी था कि उच्च न्यायालय ने अपनी मर्जी से ऐसे वाद बिंदु पर फैसला दिया है, जो किसी भी पक्षकार द्वारा नहीं मांगा गया था।

सुन्नी वक्फ बोर्ड की अपील की खास बात यह है कि उसने केवल विवादित स्थल के मालिकाना हक से जुड़े बिंदु पर अपील की थी। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि विवादित स्थल को अनादिकाल से लोग राम जन्मभूमि के रूप में मानते आए हैं। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने उच्च न्यायालय के निर्णय के इस हिस्से पर किसी प्रकार की कोई आपत्ति नहीं की है। इस अपील की दूसरी खास बात यह है कि उसने अपने आपको कानून के तकीनीकी पक्षों तक ही सीमित रखा है। उसने इस मामले से धार्मिक और भावनात्मक दूरी बनाने की कोशिश की है। यह इस अपील का एक सकारात्मक पहलू है। पंथनिरपेक्ष लोकशाही में अदालतें किसी पंथ विशेष की नहीं होतीं। वे पूरे समाज के लिए होती हैं। इसलिए न्याय का तकाजा होता है कि मुकदमेबाजी में विशुद्ध धार्मिक या भावनात्मक मुद्दों को नजरअंदाज किया जाए।

न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, अपितु न्याय होते हुए दृष्टिगोचर भी होना चाहिए। मौजूदा मामले में न्याय हुआ या नहीं, यह तो बाद में तय होगा, किंतु सुप्रीम कोर्ट को सरसरी तौर पर देखने से ऐसा जरूर प्रतीत हुआ कि न्याय होता हुआ नजर नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट के ऐसा मानने की ठोस वजह है। सर्वोच्च न्यायालय को ऐसा लगा कि उच्च न्यायालय ने अपने अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण किया। संपत्ति का बंटवारा करके उन्होंने वह उपचार दिया, जो किसी पक्षकार ने मांगा ही नहीं था। सुप्रीम कोर्ट को ऐसा भी प्रतीत हुआ कि उच्च न्यायालय ने मुकदमे के गुण-दोष के आधार पर फैसला देने की बजाय बीच का सर्वस्वीकार्य हल निकालने का प्रयास किया।

बीते दो दशकों से अदालतों ने अपनी भूमिका में गुणात्मक परिवर्तन किया है। उन्होंने फैसला देने की पारंपरिक भूमिका से अलग हटकर लोगों के लिए सर्वस्वीकार्य हल देने पर ज्यादा ध्यान देना शुरू किया। इसके अपने लाभ तथा नुकसान हैं। कई बार लोकहित के मामले में इसका लाभ मिलता है, क्योंकि उस विषय पर किसी का किसी से कोई मतभेद नहीं रहता। पर्यावरण सुरक्षा जैसे मामले इसी कोटि में आते हैं, क्योंकि स्वच्छ हवा और पानी सभी की जरूरतों में शामिल हैं। किंतु जब किसी विषय को लेकर आपसी मतभेद हों, तो वहां लोकहित वाद के सिद्धांत काम नहीं करते। ऐसे मामलों में तो न्याय के पारंपरिक तौर-तरीके ही काम करते हैं, जिसमें तथ्यों और सुबूतों की रोशनी में किए गए फैसले ही कारगर होते हैं। चाहे वह किसी के पक्ष में जाते हों या किसी के खिलाफ जाते हों। सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा आदेश में एक साफ संदेश निहित है कि अदालतों को लोकरंजन की प्रवृत्तियों से दूर रहना चाहिए। उन्हें अपने आपको मुकदमों के फैसलों और सुबूतों तक सीमित रखना चाहिए। उन्हें केवल उन्हीं बिंदुओं पर निर्णय देना चाहिए, जिन बिंदुओं पर पक्षकारों में मतभेद हों। उन्हें अपनी ओर से न तो नए तथ्य गढ़ने चाहिए और न ही वह उपचार देना चाहिए, जिसकी मांग ही न की गई हो।

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