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फैसले पर रोक

अयोध्या का राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद बेहद पेचीदा है और इसके आसानी से सुलझने की उम्मीद भी नहीं करनी चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट के स्टे ने मसले को फिर शुरुआती बिंदु पर ला खड़ा किया है। जब लखनऊ बेंच का फैसला आया था, तभी यह जाहिर था कि सभी पक्ष इससे कुछ संतुष्ट, कुछ असंतुष्ट होंगे और सारे ही पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएंगे। हाईकोर्ट के फैसले के पीछे मंशा नेक थी कि विवाद को इस तरह सुलझाया जाए कि कोई पक्ष हारा हुआ महसूस न करे और किसी किस्म की उग्रता या कड़वाहट पैदा न हो। लेकिन तब भी यह सवाल कानूनविदों ने उठाया था कि क्या यह फैसला कानून के पैमाने पर खरा उतरेगा? सुप्रीम कोर्ट ने भी स्टे देते हुए हाईकोर्ट के फैसले पर टिप्पणी की है कि यह फैसला अजीब है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि हाईकोर्ट ने विवादित जमीन का बंटवारा करने का फैसला कैसे किया, जबकि किसी भी पक्ष ने इसके लिए दरख्वास्त नहीं दी थी, इसी वजह से फैसले के बाद तमाम विवाद खड़े हो गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ विवादित 2.77 एकड़ जमीन पर ही यथास्थिति बनाए रखने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि साथ लगी हुई 67 एकड़ जमीन पर भी यह आदेश लागू होगा। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मसले की मुश्किल यह है कि यह सिर्फ कानूनी सवाल नहीं है कि उस जमीन पर मिल्कियत किसकी है। यह एक ऐसा धार्मिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक, सामाजिक मुद्दा है, जिसने आजाद भारत के इतिहास में ऐसा बेहद उग्र, उथल-पुथल भरा और हिंसक आंदोलन खड़ा कर दिया था, जिसने समाज में गहराई तक परिवर्तन ला दिया था, यहां तक कि भारतीय समाज का धर्मनिरपेक्ष चरित्र संदेहास्पद लगने लगा था। लेकिन यह भी समस्या है कि इस मामले को न सामाजिक, न सांस्कृतिक, न राजनैतिक तौर पर हल किया जा सका है और आखिरकार गेंद न्यायपालिका के पाले में डाल दी गई है। अदालत को इस मामले के कानूनी पहलुओं पर तो विचार करना होगा, जिसमें इतिहास और पुरातत्व से संबंधित सामग्री सुबूतों के तौर पर पेश की गई है, साथ ही वर्तमान समय में इस मुद्दे की अहमियत को देखते हुए भी फैसला करना होगा। हाईकोर्ट ने इसकी एक कोशिश की, लेकिन इसे न संबंधित पक्षों ने मान्य किया, न सुप्रीम कोर्ट ने इसे कानूनी कसौटी पर मजबूत पाया।

अच्छी बात यह है कि पिछले लगभग बीस वर्षो में भारतीय समाज काफी आगे बढ़ गया है और उस दौर की कड़वाहट काफी कम हो गई है। जब बाबरी मस्जिद टूटी थी, तब भारत राजनैतिक और आर्थिक रूप से बिखराव और असमंजस की स्थिति में था। अब भारत आर्थिक रूप से मजबूत है और इस बात की उम्मीद लगभग नहीं है कि धार्मिक मुद्दे पर देश का जनमत इधर-उधर हो सकता है। चुनावों में भी अब अच्छे प्रशासन का मुद्दा जाति, धर्म वगैरा के मुद्दों पर तरजीह पा रहा है। ऐसा नहीं कह सकते कि अब लोग इन मुद्दों से प्रभावित नहीं होते, लेकिन इनका प्रभाव अब उतना नहीं होता। ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा फैसला करता है, जिसे कोई एक पक्ष पसंद न करे, तो भी इस बात की आशंका कम है कि उसकी बहुत उग्र प्रतिक्रिया हो। संभव है कि कुछ लोग धार्मिक उन्माद भड़काने की कोशिश करें, लेकिन उनकी स्थिति हाशिये पर ही होनी चाहिए। हालांकि इसका फैसला जल्दी होने की उम्मीद नहीं है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आए, सरकार और समाज, दोनों का कर्तव्य है कि उसे शांतिपूर्वक लागू करवाया जाए। बाबरी मस्जिद का टूटना हमारे लोकतंत्र पर एक दाग है, एक सही फैसले का शांतिपूर्वक लागू होना इस दाग को धो डालेगा।

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