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संकट में श्रीलंकाई क्रिकेट

क्या पूर्व कप्तान हसन तिलकरत्ने अपना वायदा निभाते हुए मैच फिक्सिंग में शामिल श्रीलंकाई खिलाड़ियों के नामों का खुलासा करेंगे और वह भी तब, जब बमुश्किल एक महीने पहले ही विश्व कप के फाइनल मैच में श्रीलंकाई टीम जिस तरह से टीम इंडिया के हाथों पराजित हुई, उसे लेकर तरह-तरह के सवाल उठ रहे हैं, जिनमें से कुछ सवाल तो मैच फिक्सिंग के ही हैं? एक ऐसे देश के लिए, जिस पर पिछले दो दशकों में महज एक बार मैच फिक्सिंग में शामिल होने के आरोप लगे और आईसीसी की भ्रष्टाचार विरोधी इकाई ने जिसके किसी भी खिलाड़ी को दागी नहीं पाया, ताजा आरोप यकीनन परेशान करने वाला है और लाख टके का सवाल अब यह है कि इस तरह के लक्षणों से हमारी व्यवस्था कैसे निपटेगी? सबसे पहले तो हसन तिलकरत्ने को हर वह सुरक्षा मुहैया कराई जानी चाहिए, जो आम तौर पर अदालती गवाहों के लिए सुनिश्चित किए गए हैं।

तिलकरत्ने का एक क्रिकेटर के रूप में देश-दुनिया में व्यापक सम्मान है और उन्हें बखूबी मालूम है कि वह जो कह रहे हैं, वह कितनी गंभीर बात है या फिर जिस टीम के लिए उन्होंने खेला और बाद में उसके प्रशासक के तौर पर अपनी सेवाएं दीं, उस लिहाज से भी उनके आरोप कितने संगीन हैं। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। अभी बहुत दिन नहीं बीते हैं, जब पूर्व खेल मंत्री सीबी रत्नायके ने श्रीलंकाई क्रिकेट बोर्ड को देश का सबसे भ्रष्ट सार्वजनिक संस्थान बताया था।

हालांकि सवाल पूछा जा सकता है कि इन हताश करने वाले आरोपों के खुलासे में तिलकरत्ने ने इतना वक्त क्यों लिया, लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि श्रीलंका बोर्ड ने कभी भी अपने खिलाड़ियों पर कोई आचार संहिता नहीं थोपी और 1990 के दशक के एक उदाहरण को छोड़ दें, जब न्यूजीलैंड दौरे में अर्जुन राणातुंगा द्वारा बोर्ड के खिलाफ बगावत करने पर बोर्ड को उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी पड़ी थी, आम तौर पर खिलाड़ियों को श्रद्धा भरी निगाहों से ही देखा जाता रहा है। तो क्या तिलकरत्ने के स्तब्ध करने वाले आरोप श्रीलंकाई क्रिकेट के लिए एक मोड़ साबित होंगे?
डेली मिरर, श्रीलंका

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