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पहले ऐसा नहीं था किक्रेट बैट

पहले ऐसा नहीं था किक्रेट बैट

क्रिकेट के बैट को जैसा हम आज देखते हैं, पहले यह वैसा नहीं था। समय के साथ इसके रूप में भी बदलाव आता गया। चलो जानते  हैं इसकी दिलचस्प कहानी के बारे में।

क्रिकेट खेलने के लिए बैट का पहली बार इस्तेमाल 1624 में किया गया। 1729 में इस्तेमाल में लाया जाने वाला सबसे पुराना बैट लंदन के ओवल स्टेडियम के एक कमरे में आज भी रखा हुआ है। आज हम क्रिकेट के बैट को जिस आकार में देखते हैं, शुरू में यह ऐसा नहीं था। माना जाता है कि क्रिकेट की शुरुआत में बॉल को मारने के लिए गड़रिये की लाठी काम में लाई जाती थी।

उस समय बॉल पत्थर की और भारी होती थी, इसलिए बैट के लिए भी मजबूत लकड़ी चुनी जाने लगी। बाद में जब खेलने वालों ने देखा कि बॉल को लकड़ी के निचले हिस्से से मारना ज्यादा आसान होता है तो इसे नीचे से भारी बनाना शुरू किया गया। 18वीं सदी से पहले बैट का आकार आज की हॉकी स्टिक जैसा होता था। ऐसा इसलिए था, क्योंकि तब यह माना जाता था कि क्रिकेट केवल संभ्रांत और ऊंचे लोगों यानी अंग्रेजों का खेल है। क्रिकेट के नियम जैसे-जैसे बदलते गए बैट का आकार भी बदलने लगा। 19वीं सदी तक आते आते-आते यह लगभग आज जैसा ही हो गया था। 1880 में चाल्र्स रिचर्डसन ने जो बैट डिजाइन किया, वह आज के बैट जैसा था।

बैट को विलो की लकड़ी से बनाया जाता है। विलो, बेंत की तरह पतली लचकदार डाली वाला पेड़ होता है, बैट के लिए सफेद विलो की लकड़ी ज्यादा इस्तेमाल की जाती है, इसे क्रिकेट बैट विलो के नाम से भी जाना जाता है। इसकी लकड़ी काफी मजबूत और वजन में हल्की होती है। इस पर आसानी से खरोंच नहीं पड़ती और यह तेजी से आ रही बॉल को रोकने की क्षमता रखती है। इसके ऊपर अलसी के तेल की मालिश करके इसे और मजबूत बनाया जाता है। इससे बैट से बॉल को हिट करना आसान हो जाता है।
    
1979 में एक मैच में आस्ट्रेलिया के मशहूर खिलाड़ी डेनिस लिली ने एल्युमिनियम का बैट इस्तेमाल किया था, हालांकि इंग्लैंड टीम के विरोध के बाद उन्हें लकड़ी के बैट से ही खेलने की इजाजत दी गई, क्योंकि एल्युमिनियम का बैट, बॉल को खराब कर रहा था। इसके बाद नियम बना दिया गया कि क्रिकेट खेलने के लिए लकड़ी के बैट का ही  इस्तेमाल किया जाएगा। 2008 में बैट बनाने वाली कंपनियों ने हल्के वजन का बैट बाजार में उतारकर खिलाडियों को भारी बैट से राहत दी।

हालांकि यह किसी भी खिलाड़ी के अपने अंदाज पर निर्भर करता है कि वह हल्के बैट से खेले या भारी बैट से। कुछ समय पहले तक मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर को दुनिया में सबसे भारी बैट से खेलने वाला खिलाड़ी माना जाता था। बाद में उन्होंने कम भारी बैट से खेलना शुरू कर दिया।

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