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एडवेंचर इन दिल्ली

एडवेंचर इन दिल्ली

निक्की और आरव बस अभी-अभी आए थे, पहले भिलाई से दिल्ली आए थे गर्मी की छुट्टियां बिताने अपने चाचा के पास। चाचा उन्हें स्टेशन लेने आए और उन्हें देखते ही निक्की का चेहरा खिल गया। वह जोर से चिल्लाई, ‘चाचू, देखा ना, हम दोनों अकेले आ गए आपके पास। आप तो बहुत डर रहे थे कि पता नहीं रास्ते में क्या होगा हमारे साथ।’

निक्की आरव से एक साल छोटी थी, पर बहुत तेज। उसकी बात सुन चाचू झोंपी सी हंसी हंस कर रह गए, ‘निक्की, गाड़ी में रिजव्र्ड कंपार्टमेंट में बैठ कर आना आसान है, दिल्ली में ऐसा कुछ एडवेंचर मत करना।’
अपना सामान कंधे पर उठा कर ट्रेन से नीचे उतरते हुए आरव ने पूछा, ‘क्यों चाचू?’

चाचा ने गंभीर होकर कहा, ‘देखो, दिल्ली में हर किस्म के लोग हैं। तुम्हें बहुत सावधान रहना होगा। चलो, जल्दी करो अब। तुम दोनों को घर छोड़ कर मुझे बहुत जरूरी काम से बाहर जाना है।’

चाचा उन दोनों को लेकर पुराना बस अड्डा आ गए। बस अड्डे की भीड़ देख निक्की चौंक गई। इतने सारे लोग? इतनी सारी बसें? चाचू उन्हें लेकर बस का टिकट लेने ही वाले थे कि उनके मोबाइल की घंटी बजी। चाचू ने फोन उठाया और बात करने लगे। उनके चेहरे से लग रहा था कि वे किसी बात पर बहुत परेशान हैं।
फोन रखने के बाद वे कुछ सोचते हुए निक्की और आरव से बोले, ‘निक्की, आरव, मुझे बहुत जरूरी काम से जाना पड़ रह है, बस घंटे भर में आ जाऊंगा। तुम दोनों के लिए मैं कुछ खाने को खरीद देता हूं। यहीं बैठ कर मेरा इंतजार करना, कहीं जाना मत। ठीक है?’

आरव और निक्की को चाचा ने कोल्ड ड्रिंक और बर्गर लेकर दिया और फिर से हिदायत देते हुए सरपट वहां से निकल गए। निक्की बड़े आराम से एक बैंच पर बैठ कर आते-जाते लोगों को देखने लगी। उसे इतना बड़ा बस अड्डा एक अजूबा लग रहा था। कोल्ड ड्रिंक खत्म करने के बाद वह अपनी जगह से उठ गई, ‘आरव, मैं जरा बस अड्डा घूम कर आना चाहती हूं। तुम चलोगे?’

आरव भी बैठे-बैठे बोर हो रहा था। अपना बैग कंधे पर टांग वह भी खड़ा हो गया। वैसे भी दोनों भाई-बहन को नई-नई चीजें देखने का बहुत शौक था। बस अड्डे के पीछे चलते-चलते दोनों सामान रखने के गोदाम तक आ गए। बड़े ट्रकों से सामान उतर रहे थे। निक्की को अचानक सामने एक बड़ी सी लकड़ी की पेटी नजर आई, वह फौरन जाकर उसके ऊपर बैठ गई। अचानक उसे पेटी के अंदर से घों-घों की आवाज आई। निक्की घबरा गई और उसने जोर से आवाज दी, ‘भैया..’ आरव दौड़ा आया। पेटी अब हिलने लगी थी। आरव ने बुदबुदा कर कहा, जरूर पेटी में कुछ है।

उसने धीरे से पेटी खोल कर देखा—अंदर उसी की उम्र का एक लड़का उंकड़ू सा लेटा था। उसके हाथ-पैर बंधे थे और मुंह में टेप चिपका था। निक्की ने आगे बढ़ कर उसके मुंह से टेप निकाला, आरव ने उसके हाथ-पांव खोले।
वह लड़का हांफते हुए बोला, ‘जल्दी से मुझे यहां से कहीं ले चलो। कुछ लोग मेरा किडनैप करके यहां ले आए हैं। मैंने उनकी बात सुनी है। जल्दी ही वे यहां एक ट्रक लेकर आएंगे और मुझे उठा कर दूर कहीं ले जाएंगे।’ निक्की और आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया और तीनों दौड़ते हुए बस अड्डे की तरफ भागे। बस अड्डे में भीड़ थी। वहीं एक कोने में खड़े होकर आरव ने उसे अपनी कोल्ड ड्रिंक की बोतल दे दी।

रिनीश की सांस आई, तब उसने बताना शुरू किया। उसके पापा बिजनेस मैन थे। उनके ऑफिस में सोनू काम करता था। पिछले महीने चोरी के इल्जाम में पापा ने उसे काम से निकाल दिया था। आज सुबह रिनीश जब क्रिकेट खेलने मैदान जा रहा था, तो तीन लोगों ने पीछे से आ कर उसे पकड़ लिया और उसके मुंह पर टेप चिपका कर उसे एक गाड़ी में बिठा कर यहां ले आए। रिनीश ने यह भी सुना था कि वे लोग उसके पापा से एक करोड़ रुपए मांगने वाले हैं।

रिनीश की कहानी खत्म हुई ही थी कि सामने से दौड़ते हुए चाचा आ गए। आरव को डांटते हुए बोले, ‘तुम दोनों कहां चले गए थे? मैंने कहा था कि अपनी जगह से मत हिलना।’ निक्की धीरे से बोली, ‘चाचू, अगर हम अपनी जगह से नहीं हिलते, तो फिर रिनीश को किडनैपर्स से कैसे बचाते?’

चाचू ने ध्यान से रिनीश की बात सुनी और फौरन फोन करके पुलिस और रिनीश के पापा को बस अड्डे बुलाया। दस मिनट में पुलिस आ गई और रिनीश के पापा भी। पुलिस ने रंगे हाथ सोनू और उसके साथियों को पकड़ भी लिया। चाचू ने चैन की सांस लेते हुए कहा, ‘आरव, निक्की, अब घर चलें? तुम्हारा तो आते ही एडवेंचर शुरू हो गया है।’

अबकि रिनीश ने आरव का हाथ पकड़ कर कहा, ‘मुझे भी एक अच्छा दोस्त मिल गया है। मैं भी पूरी तरह तैयार हूं तुम्हारे साथ एडवेंचर के लिए।’ रिनीश के पापा ने अगले ही दिन आरव और निक्की को घर बुला कर ढेर सारे गिफ्ट्स दिए और पुलिस अंकल ने सबके सामने दोनों की पीठ थपथपाई। निक्की उस वक्त धीरे से फुसफुसाते हुए चाचू के कान में बोली, ‘चाचू, हम दोनों ने दिल्ली जीत ली ना?’

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