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कोई मर्द आए तो मिले महिलाओं और दलितों को पानी

पहाड़ पर पानी के लिए मीलों चलने के कष्ट नयी बात नहीं है। लेकिन प्रतापनगर के ग्वाड़ गांव का मामला दूसरा है। गांव के बीचोंबीच पानी से लबालब भरी रहने वाली बावड़ी हैं पर महिलाओं और दलितों को इससे पानी लेने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। ऐसा इसलिए है कि, बावड़ी से वे खुद पानी नहीं निकाल सकते। उन्हें गांव के किसी सवर्ण मर्द का इंतजार करना होता है। वो जब निकालकर देगा, तभी पानी लेकर घर आ पाते हैं।

पीने के पानी के लिए ग्वाड़ गांव की महिलाओं और दलितों की यह दुश्वारियां गांव में प्रचलित उस धारणा के कारण है, जिसमें यह माना गया है कि, यदि दलितों, महिलाओं ने कुएं से खुद पानी निकाला तो बावड़ी सूख जाएगी या उसमें से सांप निकलने लगेंगे।  गांव में 400 परिवार रहते हैं, जिसमें 30 परिवार दलितों के हैं।

गांववाले बताते हैं कि, कुछ साल पहले तक यह मुश्किल नहीं थी। सरकार ने गांव के लिए पेयजल लाइन बनायी थी, इसलिए बावड़ी के पानी की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन जब से पानी की यह लाइन टूटी महिलाओं और दलितों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। बावड़ी के बारे में ऐसी धारणा कब से है, गांववालों को ठीक-ठीक नहीं पता है। बुजुर्ग कमल सिंह कहते हैं, बाप, दादाओं के समय से ऐसा ही चला आ रहा है। हमारे ही गांव में नहीं, पहाड़ के कई गांवों में ऐसी धारणा है। गांव के ही धूम सिंह रावत कहते हैं, बावड़ी को देवता का प्रतीक मानने के कारण यह धारणा बनी होगी लेकिन बहुत पहले से ऐसा ही हो रहा है। वे बताते हैं, 15 साल पहले बावड़ी सूख गई थी। पूजा-पाठ की तो दोबारा इसमें पानी आया। गांव के एक और बुजुर्ग तोता सिंह का कहना है कि एक बार महिलाओं द्वारा अनजाने में पानी निकालने पर बावड़ी से सांप निकलने लगे थे। इसके बाद गांववालों ने कोप से बचने के लिए सामूहिक पूजा-अर्चना और हवन किया था। तब सांप निकलने बंद हुए।

गांव की प्रधान पवना देवी कहती हैं, बावड़ी से पानी न निकालने के लिए कोई फरमान नहीं सुनाया गया है, सांप निकलने और बावड़ी सूखने के डर से ही दलित और महिलाएं खुद ऐसा करती हैं।

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