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उत्तर प्रदेश के मोर्चे पर कांग्रेस

अभी कई राज्यों के विधानसभा चुनाव चल रहे हैं। इसके पहले कि उनके नतीजे आएं, कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में नया मोर्चा खोल दिया है। पिछले दिनों बुंदेलखंड के बांदा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राहुल गांधी की रैली एक तरह से चुनावी शंखनाद ही थी। प्रधानमंत्री ने इस पिछड़े क्षेत्र के विकास की कई घोषणाएं कीं। पेयजल की समस्या दूर करने के लिए 200 करोड़ रुपये देने के साथ ही झांसी में एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय खोलने और हर जिले में एक सेंट्रल कॉलेज खोलने का ऐलान किया गया।

इस रैली से कांग्रेस पार्टी और केंद्र सरकार जो संदेश देना चाहते थे, वह साफ था, हम उत्तर प्रदेश को आगे ले जाना चाहते हैं, लेकिन लखनऊ में बैठी सरकार इसमें बाधा बन रही है। यानी अब मतदाताओं को कांग्रेस को वोट देना चाहिए। यह रैली तब हुई है, जब उत्तर प्रदेश के दो बड़े नेता मयावती और मुलायम सिंह यादव लोक लेखा समिति में कांग्रेस के साथ खड़े हैं। ऐसे में रैली का सीधा-सा अर्थ यह है कि जमीन पर उनमें कोई युद्ध विराम नहीं हुआ है।

पूरे देश में कहीं के भी मुकाबले उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का दांव बहुत बड़ा है। यहां पार्टी 1989 से ही सत्ता से बाहर है। पार्टी को अगर राष्ट्रीय स्तर पर अपने पुराने दौर में लौटना है, तो शुरुआत उत्तर प्रदेश से ही करनी होगी। अभी जिन राज्यों में चुनाव चल रहे हैं, उनमें तमिलनाडु में पार्टी 1967 में ही सत्ता से बाहर हो गई थी, और पश्चिम बंगाल में उसके दस साल बाद। लेकिन राहुल गांधी की सबसे ज्यादा सक्रियता उत्तर प्रदेश में ही दिखाई पड़ती है। वह पिछले कई साल से बसपा सरकार के कामकाज पर उंगली उठा रहे हैं। लेकिन उप-चुनावों के नतीजों से ऐसा नहीं लगता कि मतदाताओं पर इसका कुछ असर पड़ा है।

उत्तर प्रदेश को लेकर कांग्रेस के चिंतित होने के बहुत से कारण भी हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी लगभग सौ विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी। पार्टी अब इसी आधार पर अपना विस्तार करके प्रदेश की दूसरी बड़ी राजनैतिक ताकत बनना चाहती है।

पार्टी को उम्मीद है कि अगर उसने पूरा दम लगा दिया, तो वह बहुजन समाज पार्टी का गणित बिगाड़ सकती है। विकास का मुद्दा उठाकर वह जाति और समुदाय की परंपरागत वफादारी को दरकिनार करना चाहती है। लोकसभा चुनाव में उसे इसी का फायदा मिला था और वह अब उसी फॉर्मूले को फिर दोहराना चाहती है। लेकिन 2009 के मुकाबले अब हालात काफी बदल गए हैं।

प्रदेश की मुख्यंमंत्री ने अपना आधार बढ़ाने के लिए कई कल्याणकारी कार्यक्रम और विकास परियोजनाएं शुरू की हैं। इनमें गरीबी हटाने के लिए बनी महामाया योजना भी है, जिसमें 30 लाख लोगों को सीधे नगर धनराशि सौंपी गई है। इसके अलावा गंगा और यमुना एक्सप्रेस-वे की परियोजनाएं भी उत्तर भारत की सबसे बड़ी परियोजनाओं में शुमार हो रही हैं। इनमें से हर परियोजना का राजनैतिक प्रभाव क्षेत्र काफी बड़ा है, जो यह बताता है कि कई दूसरी पार्टियों की तरह ही बहुजन समाज पार्टी भी अब यह सीख गई है कि अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाने के लिए सरकार की मशीनरी का किस तरह से इस्तेमाल किया जाए।

शहरी विकास, बेहतर स्वास्थ्य सेवा और अच्छी सड़कें इन सबसे निश्चित तौर पर गरीबों को सबसे ज्यादा फायदा होगा, लेकिन इसका एक बहुत बड़ा सकारात्मक प्रभाव भी पड़ेगा। अतीत में, उत्तर प्रदेश की ही तरह दिल्ली विधानसभा के चुनावों में भी बहुजन समाज पार्टी शहरी क्षेत्र में बहुत ज्यादा वोट हासिल करने में कामयाब नहीं हो सकी थी।

लेकिन अब जवाहरलाल नेहरू अर्बन रिन्यूवल मिशन के तहत जिस तरह से ग्रेटर नोएडा समेत उत्तर प्रदेश के 40 शहरों का विकास किया जा रहा है, उससे लोगों तक यह संदेश भी पहुंच रहा है कि मायावती के पास शहरी नियोजन की भी एक समझ है। हालांकि अभी यह नहीं कहा जा सकता कि वह नरेंद्र मोदी या फिर नीतीश कुमार की तरह विकास योजनाओं के जरिये अपने आधार को कितना बढ़ा पाएंगी।

नीतीश कुमार के साथ एक अच्छी बात यह थी कि उन्होंने अपनी पार्टी के लिए एनडीए को एक प्लेटफॉर्म की तरह इस्तेमाल किया। लेकिन नीतीश कुमार के पास उस तरह का अखिल भारतीय आधार नहीं है, जिस तरह का आधार मायावती के पास अपने दलित वोट बैंक के कारण है। और फिर उन पर नरेंद्र मोदी की तरह सांप्रदायिक दंगों या नरसंहार का कोई कलंक भी नहीं लगा है।

और कांग्रेस इसी से उत्तर प्रदेश के उस क्षेत्र में सक्रिय हुई है, जो बहुजन समाज पार्टी का मजबूत गढ़ बनकर उभरा है। बुंदेलखंड में प्रधानमंत्री ने शिक्षा और कल्याणकारी कार्यक्रमों का जो पैकेज घोषित किया, वह एक तरह से राहुल गांधी की उस अपील का ही नतीजा है, जिसमें उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार को अपनी वर्तमान योजनाओं की री-पैकेजिंग करनी चाहिए। लोगों ने इन घोषणाओं का बहुत उत्साह के साथ स्वागत भी किया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह उत्साह मतदान के दिन तक कायम रह पाएगा?

यह कोई अकादमिक सवाल नहीं है। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अगले साल ही होने हैं और इस बीच कांग्रेस को खुद को चुनाव लड़ पाने की स्थिति में लाना होगा। अभी तक राहुल गांधी का ज्यादा ध्यान पार्टी की युवा और छात्र शाखा के पुनर्गठन पर ही रहा है। लेकिन यह रणनीति पिछले साल बिहार में नाकाम रही थी। इस बार केरल और तमिलनाडु में इस रणनीति की परीक्षा है। इस रणनीति में समर्थ युवा राजनैतिक नेताओं को बढ़ावा देने के बजाय पढ़े-लिखे युवकों और युवतियों को आगे लाने की कोशिश की गई। लेकिन ये सब वे लोग नहीं थे, जो कांग्रेस के लिए जन समर्थन जुटा सकें।

एक बात तो तय है कि मायावती खराब प्रशासन के राहुल गांधी और प्रधानमंत्री के आरोपों का पूरा जवाब देंगी। लखनऊ में जो पार्टी सत्ता में बैठी है, उसके पास समर्पित कार्यकर्ताओं की पूरी फौज है, जो उसकी ताकत भी है। बहुजन समाज पार्टी को उम्मीद है कि वह इसका इस्तेमाल करके अपने विरोधियों को धूल चटा सकेगी और सत्ता में वापस आएगी। दूसरी तरफ, कांग्रेस इन चुनावों में खराब प्रदर्शन के बारे में सोच भी नहीं सकती। इससे उसकी साख को जो धक्का लगेगा, उसका असर अगले आम चुनाव पर पड़ सकता है।

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