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पांच मिनट का सवाल है

सोचने की फुरसत ही कहां है? दिन भर में कुछ न कुछ होता रहता है। कोई न कोई गैजेट हरकत करता रहता है। मोबाइल की बीप बंद होने का नाम ही नहीं लेती। अगर कॉल नहीं होते, तो मैसेज चलते रहते हैं। लगता है कि कोई साजिश है। कहीं हमारे दिमाग को चैन न मिल जाए।

हम क्या-क्या नहीं करते? लेकिन अपनी सोच के लिए फुरसत नहीं मिलती। डॉ. ब्रैड वाटर्स कहते हैं कि बस, भागते ही मत रहो। थोड़ा-सा ठहर जाओ। अपने मन को शांत करो। पिछले को भूलने की कोशिश करो और अपनी सोच के लिए फुरसत निकालो। भले ही वह दिन में पांच मिनट के लिए ही हो। वह मशहूर क्राइसिस काउंसलर हैं। एक अलग किस्म की किताब उन्होंने लिखी है ‘डिजाइन योर पाथ।’ इसी नाम से उनकी वेबसाइट भी है।

हम सुनते ही रहते हैं कि अपने लिए वक्त निकालना चाहिए। लेकिन उसका क्या मतलब है? हम दूसरों के लिए खटते रहते हैं। कभी अपना खयाल नहीं रखते। सो, अपने लिए भी कुछ होना चाहिए। यहां अपने लिए वक्त निकालने के मायने बिल्कुल अलग हैं। उसके सीधे-से मायने हैं कि ऐसा वक्त जब आप पूरी तरह अपनी सोच के साथ हों।

दिन भर में हमें सूचनाओं का हमला झेलना होता है। उस पर हमारी क्या सोच है? इस पर तो दिमाग ही नहीं जाता। यानी हम दूसरों की सोच पर ही चलते चले जाते हैं। पहले से ही हमारा दिमाग भरा होता है। धड़ाधड़ आते संदेशों से वह जाम हो जाता है। अपनी तरह से सोचने के लिए हमें उस जाम को हटाना होता है। धीरे-धीरे छांटना होता है। तब जाकर हम कहीं अपने लिए रास्ता निकाल पाते हैं। हमें जाम में अगर खो नहीं जाना है, तो कुछ करना ही पड़ेगा। अपने लिए, अपनी तरह से सोचना होगा। लेकिन उसके लिए तय करके वक्त निकालना पड़ेगा। बस, पांच मिनट ही दे दीजिए।

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