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क्या भला, क्या बुरा

थोड़ी अतिशयोक्ति का सहारा लिया जाए, तो यह माना जा सकता है कि ‘कोलेस्टरॉल’ शब्द से आजकल बच्चा-बच्चा परिचित है। डॉक्टरों का तो यह तक कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर और बढ़े हुए कोलेस्टरॉल के प्रकोप से बच्चे भी नहीं बचे हैं। थोड़े-से ज्यादा जिज्ञासु लोग ‘अच्छे कोलेस्टरॉल और बुरे कोलेस्ट्रॉल’ से भी परिचित होते हैं।

ज्यादा विस्तार में न जाएं, तो संक्षेप में अच्छा कोलेस्टरॉल वह है, जो दिल की धमनियों में जमाव नहीं बनने देता और बुरा कोलेस्टरॉल धमनियों में जमाव और उसकी वजह से दिल की बीमारी का कारण बनता है। बताया यह जाता है कि सूखे मेवों, कुछ किस्म के वनस्पति तेलों से अच्छा कोलेस्टरॉल बढ़ता है और फास्ट फूड, तला हुआ भारी खाना वगैरा खाने से बुरा कोलेस्टरॉल बढ़ता है।

लेकिन एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का दावा है कि बुरा कोलेस्टरॉल कोई खलनायक नहीं है, बल्कि वह तो फायदेमंद है। इसका अर्थ यह नहीं कि हम अनाप-शनाप खाने की ओर टूट पड़ें, लेकिन इस कोलेस्टरॉल के शरीर में बढ़ने का एक फायदा यह है कि वह शरीर के अंदरूनी तंत्र को एक चेतावनी देता है कि सब कुछ ठीक नहीं है और इसके लिए कुछ उपाय करना जरूरी है।

इसलिए अगर ऐसे लोग व्यायाम करते हैं, तो उनका शरीर ज्यादा तेजी से मांसपेशियां बनाता है, यानी शरीर में फैट के बरक्स मांसपेशियों का अनुपात बेहतर हो जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि कोलेस्टरॉल की उपस्थिति मांसपेशियां बनने के लिए महत्वपूर्ण है।

इसी तरह कुछ दिन पहले एक विवादास्पद शोध में दावा किया गया कि नमक का हाई ब्लड प्रेशर से कोई लेना-देना नहीं है। दिक्कत यह है कि रोज एक नया शोध होता है, जो किसी पुरानी धारणा को झुठलाता है। अभी तक लोगों को घी खाने से रोका जाता था, लेकिन अब माना जाता है कि सीमित मात्रा में घी खाना अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। कुछ बरस पहले सूखे मेवों को सेहत का दुश्मन माना जाता था, आज उनकी, खासकर अखरोट और बादाम की गिनती ‘सुपर फूड’ में होती है।

हम सब लोग बचपन से चाय के दुष्परिणामों की बातें चाय की हर चुस्की के साथ निगलते रहे, पर अब बताया जाता है कि चाय में एंटी ऑक्सिडेंट्स होते हैं, जो बुढ़ापे को दूर रखते हैं। कॉफी भी स्वास्थ्यवर्धक मान ली गई है, यहां तक कि सीमित मात्रा में शराब को भी सेहत के लिए बेहतर मान लिया गया। हालांकि कौन सेहत के लिए चाय, कॉफी या शराब पीता है?

ऐसी परस्पर विरोधी जानकारी के चलते हम क्या करें? रोज अपनी राय और भोजन बदलते रहें, तो मुश्किल हो जाएगी। जवाब यह है कि पुराने जमाने की समझदारी ठीक है। डॉक्टर कहते हैं कि सीमित मात्रा में हर चीज अच्छी है। सबसे बड़ी बात यह है कि कोई अतिरेक न करें, न कोई अजीबोगरीब डाइट पर चले जाएं, ये सेहत के सबसे बड़े दुश्मन हैं।

हमारे शरीर का तंत्र एक खास अनुपात में विभिन्न खाद्य तत्वों को ग्रहण करता है, उसके साथ छेड़खानी न करें। ज्यादा फैट खाना बुरा है, लेकिन बिल्कुल न खाना उतना ही बुरा है, क्योंकि तब आप कुछ विटामिनों से महरूम रह जाएंगे। अतिरिक्त प्रोटीन वाले खाने से आपकी मांसपेशियां बनें या नहीं, आपके गुर्दों पर ज्यादा जोर जरूर पड़ेगा।

हमारे रोजमर्रा के भारतीय भोजन के बारे में यह माना जाता है कि वह बेहद संतुलित आहार है, इसलिए दाल, रोटी, सब्जी सबसे बढ़िया है। दुनिया भर में हो रहे शोध के बारे में पढ़ें जरूर, लेकिन उनके निष्कर्षो को अपनाने के लिए कूद न पड़ें। कल अगर किसी शोध ने आज का निष्कर्ष गलत सिद्ध कर दिया, तो फिर क्या करेंगे? मध्य मार्ग की महिमा सबने गाई है, वही श्रेष्ठ मार्ग है।

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