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न्याय में बढ़ी आस्था

सुप्रसिद्ध मानवाधिकार कार्यकर्ता विनायक सेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला ऐतिहासिक तथा स्वागतयोग्य है, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक राष्ट्र है और यहां के प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र जीवन का मौलिक अधिकार प्राप्त है। माओवादियों से सहानुभूति रखने मात्र से विनायक सेन अपराधी नहीं हो जाते। किसी के मानवाधिकारों के हनन पर आवाज बुलंद करने या उससे सहानुभूति जताने पर अगर उसे देशद्रोही करार दिया जाता है, तो फिर मौलिक अधिकारों और मानवाधिकारों से जुड़े सांविधानिक प्रावधानों का क्या औचित्य रह जाएगा? अगर सरकार किसी को भी देशद्रोही करार देकर उसे सलाखों के पीछे रखने लगी, तब तो यहां निरंकुश शासन व्यवस्था कायम हो जाएगी। खुशी की बात यह है कि देश की न्यायपालिका अभी ईमानदार व सक्रिय है। विनायक सेन के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मानवीय मूल्यों को ध्यान में रखकर न्यायोचित फैसला सुनाया है, जिससे जनता की आस्था न्यायपालिका में बढ़ी है।
सत्य प्रकाश

तोल मोल के बोल   
दिग्गी राजा देश के संतों, बाबाओं और धर्म प्रचारकों के लिए सदा आग उगलते रहते हैं, मगर एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी का नाम बड़े सम्मान से (ओसामा जी) लेते हैं। आखिर क्या हो गया है दिग्विजय बाबू को़..? इन दिनों वह जो कुछ भी बोलते हैं, उससे विवाद पैदा हो जाता है। क्या वह जान-बूझकर ऐसा करते हैं, ताकि खबरों में बने रहें या फिर लापरवाहीवश ऐसा कर देते हैं? अब इसका जवाब तो दिग्गी राजा ही दे सकते हैं, लेकिन उनके वक्तव्यों से कांग्रेस की खूब फजीहत हो रही है।
सतीश त्यागी, ‘काकड़ा, गाजियाबाद

ये भी दागदार हैं
जन-लोकपाल बिल हो या फिर कोई भी नया कानून। उन्हें बनाने के लिए अगर दिल्ली के जंतर-मंतर पर अपने साथियों के साथ सिर्फ भूख-हड़ताल करना ही काफी है, तो फिर देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में यकीन रखते हुए लोकसभा का चुनाव जीतकर संसद सदस्य बनने की क्या आवश्यकता है? देश की आजादी के बाद से अब तक जितने भी विधेयक संसद द्वारा पारित किए गए हैं, क्या उनके कानून बनने से पहले किसी ड्राफ्टिंग कमिटी का गठन कर उसमें गैरसरकारी लोगों को शामिल किया गया था? यदि हां! तो फिर देश की सबसे बड़ी पंचायत संसद का क्या महत्व है, और यदि नहीं! तो क्या केंद्र सरकार चंद ऐसे लोगों के सामने घुटने टेक दिए, जिन्होंने भूख-हड़ताल द्वारा दबाव बनाया? जबकि ड्राफ्टिंग कमिटी में उनकी तरफ से शामिल कई लोगों के दामन खुद ही दागदार दिख रहे हैं।
फैज अहमद फैज

लीबिया का संकट
ओसामा की मौत ने दुनिया का ध्यान लीबिया की दयनीय स्थिति से हटा दिया है। गद्दाफी अब भी नहीं समझ रहे हैं कि विश्व जनमत के खिलाफ जाने का हश्र क्या हो सकता है। उनके कुनबे के कई सदस्य मारे गए, कितने ही लोगों ने अपनी वफादारियां बदल ली हैं। शायद ऐसी ही स्थिति को देखकर रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा होगा, जब नाश मनुज पर छाता है, पहले विवेक मर जाता है।  गद्दाफी लीबिया को सर्वनाश की तरफ ले जा रहे हैं। आखिर सत्ता इतनी प्यारी कैसे हो सकती है कि जिस मुल्क को आपने प्रेम से सींचा हो, उसे ही नेस्तनाबूद करने पर आमादा हो जाएं?
राकेश सिंह, लक्ष्मी नगर, दिल्ली-92

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