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मेरे बच्चों ने मुझे जीने का हौसला दिया

कभी कभी लगता है कि न जाने अल्लाह की इबादत में कौन-सी कमी रह गई कि उन्होंने मेरी औलाद छीन ली। लिवर की बीमारी से ग्रस्त मेरी बड़ी बिटिया पिछले 12 फरवरी को मुझे अलविदा कहकर चली गई। मैंने हाल में ही अपनी औलाद खोई है, मैं जानती हूं कि जिसे नौ महीने कोख में रखा उसे आखिरी सांसें लेते देखना कलेजे को कितना छलनी करता है। आंखों में आंसू ने मानो घर-सा कर लिया है, जरूरत है तो बस बिटिया की याद आने की।

आज ‘मदर्स डे’ है, आज के दिन मैं बिल्कुल नहीं रोऊंगी। मेरा आज दिनभर उन बच्चों के साथ गुजरेगा। मेरे करियर के शुरुआती दिन काफी संघर्षपूर्ण रहे हैं। थोड़े-थोड़े पैसों के लिये ग्रुप डांस में छोटे-से रोल पाकर मैंने अपनी पहचान पाई। उसी में मिले पैसों से दो वक्त की रोटी का जुगाड़ किया। मेरे बच्चों ने कभी किसी तरह की नाजायज मांग नहीं रखी, जहां चार पैसों की जरूरत होती वहां दो में ही काम चला लेते।

वो मेरे बच्चे ही हैं जिन्होंने बार-बार टूटते सब्र को जकड़ कर रखने का हौसला दिया। मेरे बच्चों को बेहद खुशी होती है जब देश-विदेश के लाखों-करोड़ों बच्चे मुझे मां का दर्जा देकर गले लगते हैं। तब मुझे ऐसा लगता है कि ये मेरे नेक करम ही हैं कि अल्लाह ने इन लाखों-करोड़ों बच्चों पर ममता उड़ेलने का मौका दिया।

आज मेरी अम्मी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन मेरी रूह-रूह में उनकी यादें बसीं हैं। जितना दुलार मैंने अपनी मां से पाया उतना ही अपने बच्चों और चाहने वाले बच्चों पर लुटाया। वे मुझे कहीं से देख रहीं हो तो उन्हें इस बात का गर्व होगा कि उनकी बेटी ने अपनी जिम्मेदारी पूरी ईमानदारी के निभाई है।
(सत्या सिन्हा से बातचीत पर आधारित)

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