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बच्चों को जन्म देते हुए मर जाती हैं एक-लाख मांएं

मदर्स डे पर ये आंकड़े बैचेनी पैदा करते हैं। देश में आज भी हर साल तकरीबन एक लाख महिलाओं की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। यह स्थिति तब है जब आज हम चांद पर पहुंचने और विकसित देशों के रहन-सहन को प्राप्त कर लेने का दावा करते हैं। यूनिसेफ के अनुसार भारत में प्रसव के दौरान होने वाली मौतें पहले से घटी हैं, लेकिन यह अब भी बहुत ज्यादा हैं। मां बनने वाली एक लाख महिलाओं में 230 महिलाएं बच नहीं पाती हैं। देश में हर साल करीब 2.5 करोड़ महिलाएं मां बनती हैं।

शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ है। इसलिए चिकित्सा कार्मिकों की देखरेख में होने वाले प्रसव भी बढ़े हैं। मांओं की मौतें भी कम हुई हैं। लेकिन गांवों की स्थिति ज्यादा नहीं बदली। ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन से गांवों के लिए स्वास्थ्य का बजट बढ़ा है, लेकिन वहां डॉक्टर और नर्से नहीं हैं। सरकार के पास दूसरा उपाय नहीं है इसलिए मिडवाइफ व ग्रामीण दाइयों को प्रसव कराने की ट्रेनिंग दी जा रही है। लेकिन यह स्थायी और प्रभावी समाधान नहीं है। इसलिए बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उड़ीसा आदि में प्रति एक लाख महिलाओं में 400 की प्रसव के दौरान मौत हो जाती है। जबकि केरल में सिर्फ 95 और तमिलनाडु में 111 महिलाओं की मौत होती है। यूं कहें कि दक्षिणी राज्यों में मांओं पर खतरा कम है तो गलत नहीं होगा।

स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार प्रसव की जटिलताओं के कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण कम उम्र में मां बनना है। अन्य वजहों में कुपोषण, रक्त अल्पता, प्रसव से जुड़ी जटिलताएं, जेनेटिक डिसआर्डर और प्रसव पूर्व और प्रसव के बाद मां को उपचार और पर्याप्त देखभाल नहीं मिल पाना है।

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