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बुंदेलखंड में 'अपनी रसोई' सफलता की मिसाल

बुंदेलखंड में 'अपनी रसोई' सफलता की मिसाल

अपने घर की रसोई के दायरे से निकलकर कैटरिंग जैसे खांटी मर्दों के काम में उनका वर्चस्व तोड़ते हुए बुंदेलखंड की कुछ निरक्षर महिलाएं कामयाबी और आत्मनिर्भरता की नई इबारत गढ़ रही हैं।

चित्रकूट के कर्वी कस्बे में आस-पास के गांवों की 20 अनपढ़ महिलाओं का एक समूह पिछले कुछ सालों से 'अपनी रसोई' नाम से कैटरिंग सेवा चला रहा है। अच्छी सेवाओं के चलते कर्वी के साथ-साथ आस-पास के दूसरे जिलों में भी इनकी सेवा काफी लोकप्रिय हो गई है। यह कैटरिंग समूह जन्मदिन, मुंडन, उद्घाटन समारोहों जैसे छोटे कार्यक्रमों से लेकर शादी-ब्याह तक में खाने-पीने की पूरी व्यवस्था का ठेका लेता है।

'अपनी रसोई' की संचालक कमलेश देवी ने बताया कि शादियों के मौसम में तो वे लोग काफी व्यस्त रहती हैं। बाकी दिनों में भी छोटे-मोटे समारोह में कैटरिंग सेवा के ऑर्डर मिलते रहते हैं।

कमलेश कहती हैं, ''हम अभी अधिकतम 500 लोगों तक के खाने की व्यवस्था का ही ऑर्डर लेते हैं। ग्राहक से उसके द्वारा बनाई गई व्यंजनों की सूची लेने के बाद उसके आधार पर इसके लिए लिया जाने वाला शुल्क निर्धारित करते हैं।''

बुकिंग हो जाने के बाद कमलेश निर्धारित तारीख को कैटरिंग की साथी महिलाओं को साथ लेकर समारोह स्थल पहुंच जाती हैं और ग्राहक से अनाज, सब्जियां व मसाले लेकर खाना तैयार करती हैं। अगर कोई ग्राहक 'फुल कैटरिंग' सेवा ले तो 'अपनी रसोई' की महिलाएं अनाज, सब्जी और मसाले सहित अन्य खाद्य पदार्थ खुद ले जाकर भोजन तैयार करती हैं लेकिन इस सेवा का शुल्क ज्यादा होता है।

कमलेश बताती हैं कि समूह ने गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) वनांगना के सहयोग से टिफिन सेवा से अपने काम की शुरुआत की थी। लगातार कठिन मेहनत कर और मुनाफे का पैसा एकत्र कर बाद में कैटरिंग का काम शुरू किया गया, जिसे सफलता मिलती गई। 'अपनी रसोई' की महिलाएं कर्वी, चित्रकूट के साथ पड़ोस के बांदा, ललितपुर, महोबा, जालौन के अलावा लखनऊ में भी जाकर अपनी कैटरिंग सेवाएं दे चुकी हैं।

'अपनी रसोई' की सदस्य रामकली गर्व से कहती हैं कि अब उन्हें पैसों के लिए अपने पतियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। कैटरिंग से होने वाली कमाई से बच्चों की स्कूल फीस, रोजमर्रा की छोटी-मोटी जरूरतें पूरी होने के साथ गृहस्थी के भी कुछ खर्चे चल जाते हैं। आज यह कैटरिंग समूह सारे खर्च निकाल लेने के बाद तीन से चार लाख रुपए सालाना की बचत कर लेता है। मुनाफे की राशि को महिलाओं को आपस में बांट दिया जाता है।

यह समूह कर्वी में नियमित रूप से टिफिन सेवा भी चलाता है। कमलेश ने बताया कि लगभग 100 से ज्यादा छात्र, नौकरी पेशा व अन्य लोग तीस रुपये की दर से उनके टिफिन का खाना खाते हैं। वनांगना की कार्यकर्ता अवधेश कुमारी कहती हैं कि उनके संगठन का मुख्य मकसद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने कहा, ''हमारे संगठन ने कैटरिंग शुरू करने में इन महिलाओं की मदद की थी, लेकिन आज इन्होंने जो मुकाम पाया है उसमें इनकी कठिन मेहनत का योगदान है।''

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