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पांच शक्तिशाली महिलाओं की ताकत

भारतीय राजनीति के एक महत्वपूर्ण पक्ष पर कम ध्यान दिया जाता है, वह है सर्वोच्च स्तर पर महिलाओं का प्रभाव। देश में सबसे ज्यादा शक्तिशाली एक महिला है। देश के सबसे बड़े राज्य में भी एक महिला ही सबसे ज्यादा शक्तिशाली है। लोकसभा में विपक्ष की नेता भी महिला है। दो हफ्ते बाद पश्चिम बंगाल में भी सबसे शक्तिशाली एक महिला होगी और संभवत: तमिलनाडु में भी ऐसा ही होगा।

यह एक असाधारण संयोग है, खासतौर पर इसलिए कि दक्षिण एशिया में महिलाओं को ऐतिहासिक रूप से दबाकर रखा जाता है। भारत के प्रमुख धर्म शास्त्र और लोक के स्तर पर महिलाओं की आजादी के खिलाफ हैं। वे इसके भी खिलाफ हैं कि महिलाएं अपने बारे में खुद फैसले करें, बल्कि वे चाहते हैं कि उनके पिता, भाई या पति उनके बारे में फैसले करें। इसके बावजूद हमारे देश में और कई बड़े राज्यों में नीतियां महिलाओं द्वारा बनाई जा रही हैं। करोड़ों भारतीयों का भविष्य वे महिलाएं तय कर रही हैं जिनके बारे में माना जाता था कि वे पुरुषों के अधीन रहेंगी।

सोनिया गांधी, मायावती, सुषमा स्वराज, जयललिता और ममता बनर्जी के आगे बढ़ने और लगातार ताकतवर होते जाने का कारण क्या है? शक्की लोग कहेंगे कि ममता बनर्जी के अलावा अन्य सारी महिलाएं अपने पुरुष संरक्षक या परिवार के सदस्यों की मदद से यहां पहुंची हैं।

अगर सोनिया गांधी राजीव गांधी की विधवा नहीं होतीं तो क्या वे कांग्रेस की अध्यक्ष बन सकती थीं। मायावती कांशीराम की और जयललिता एमजी रामचन्द्रन की घोषित उत्तराधिकारी थीं। सुषमा स्वराज को शुरुआती दिनों में उनके पति पूर्व समाजवादी नेता स्वराज कौशल का समर्थन हासिल था और भारतीय जनता पार्टी में फिलहाल उनकी तरक्की पुरुष समर्थकों, खासकर कर्नाटक के रेड्डी भाइयों के समर्थन से संभव हुई है।

ममता बनर्जी का राजनैतिक कैरियर अलबत्ता पुरुष संरक्षण का मोहताज नहीं रहा बल्कि वे ताकतवर पुरुषों को चुनौती देकर ही आगे बढ़ी हैं। सबसे पहले वे 1974 में जयप्रकाश नारायण की कार पर उछलकूद मचाकर प्रसिद्धि में आईं और उसके बाद उन्होंने कोलकाता की जादवपुर लोकसभा सीट पर 1984 में कम्युनिस्ट नेता सोमनाथ चटर्जी को हराया।

दरअसल सोनिया, मायावती या ऐसी ही महिलाएं किसी पुरुष की मेहरबानी से आगे नहीं आईं बल्कि वे सामाजिक सुधारकों की कई पीढ़ियों की बनाई एक ऐतिहासिक प्रक्रिया से आगे बढ़ी हैं। 19वीं शताब्दी के शुरू में राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के उन्मूलन के जरिए ईसाई मिशनरियों की चुनौती को स्वीकार किया। उन्होंने यह भी प्रतिपादित किया कि नैतिक और बौद्धिक स्तर पर महिलाएं पुरुषों के बराबर हैं।

राममोहन राय के बाद ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फूले और धोंडोकेशव कर्वे जैसे लोग आए, जिन्होंने महिला शिक्षा को आगे बढ़ाया। महात्मा गांधी ने महिलाओं को स्वतंत्रता संग्राम में साथ लिया और जवाहरलाल नेहरू और भीमराव अंबेडकर ने महिलाओं को पुरुषों की ही तरह मताधिकार दिलवाया (पश्चिम में उन्हें मताधिकार कई दशकों बाद मिला) और व्यक्तिगत और पारिवारिक कानूनों को बदला ताकि भारतीय महिलाएं संपत्ति पर अधिकार पा सकें और अपना जीवन साथी चुन सकें।

राममोहन राय के अलावा इन पुरुष सुधारकों को उतनी ही तेजस्वी महिलाओं से सहयोग, चुनौती और उकसावा मिला, खासतौर पर महाराष्ट्र में कुछ असाधारण और प्रभावशाली महिलाएं हुईं, जिनमें पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिन्दे मुख्य हैं। दक्षिण से अम्मु स्वामीनाथन, डॉक्टर मुत्थुलक्ष्मी रेड्डी और कमलादेवी चट्टोपाध्याय आईं। इन नारीवादी महिलाओं ने सामाजिक रीतियां और सरकारी कानून बदले ताकि महिलाओं का अर्थव्यवस्था, शिक्षा, कला और राजनीति में योगदान बढ़ सके।

इतिहास और पारिवारिक पृष्ठभूमि की अपनी भूमिका है, लेकिन इन महिलाओं के व्यक्तिगत गुणों का भी इसमें भारी योगदान है। सोनिया गांधी एक प्रधानमंत्री की पत्नी और एक अन्य प्रधानमंत्री की बहू हैं, यह सच है, लेकिन उनकी पार्टी को पतन की खाई से निकालकर फिर से प्रभावशाली बनाने में उनके संकल्प और हिम्मत को कौन झुठला सकता है।

मायावती और जयललिता को दुष्ट और बदला लेने वाले पुरुष विरोधियों का मुकाबला करना पड़ा और वे विजयी रहीं। मायावती को एक और मुश्किल का सामना करना पड़ा क्योंकि वे दलित हैं और भारत में अभी भी ऊंची जातियों का एकाधिकार है। इसके बरक्स जयललिता ब्राह्मण विरोधी राजनैतिक माहौल में ब्राह्मण होकर भी सफल हुईं।

हिन्दू दक्षिणपंथी, प्रतिक्रियावादी और पुरुषवादी है और सुषमा स्वराज को इन दोनों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है। कई मायनों में ममता बनर्जी का सफर इन सबसे मुश्किल रहा है क्योंकि उन्हें हर जिले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पुरुष दादाओं का मुकाबला करना पड़ा है। अजीब बात यह है कि उन पार्टियों और इलाकों में महिलाएं हाशिए पर हैं, जहां परंपरागत रूप से पुरुष वर्चस्व नहीं है।

सारी दुनिया के कम्युनिस्ट स्त्री-पुरुष बराबरी का दावा करते हैं,लेकिन माकपा में न केरल में, न पश्चिम बंगाल में कोई महत्वपूर्ण महिला नेता  है। आदिवासी संस्कृति में भी परंपरागत रूप से महिलाओं को ज्यादा आजादी है, लेकिन बहुत सोचने पर भी किसी महत्वपूर्ण आदिवासी महिला राजनेता का नाम याद नहीं आता। उत्तर-पूर्व के आदिवासी और ईसाई समुदायों में हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के मुकाबले महिलाओं को ज्यादा सम्मान दिया जाता है, लेकिन उत्तर-पूर्व के राज्यों में सिर्फ पुरुष ही मुख्यमंत्री क्यों होते हैं?

इसी तरह सिख धर्म में भी महिलाओं को ज्यादा सम्मान दिया जाता है, लेकिन अब तक पंजाब में सिर्फ एक महिला बहुत थोड़े वक्त के लिए मुख्यमंत्री बनी। भारत में कहीं भी एक भी महत्वपूर्ण मुस्लिम महिला नेता नहीं है। इसका समाजशास्त्रीय कारण तो दिया जा सकता है, लेकिन जितना जल्दी हो सके, इस कमी को दूर करने की कोशिश होनी चाहिए।

सोनिया, सुषमा, ममता, मायावती और जयललिता की ताकत को भारतीय समाज में महिलाओं के खिलाफ भेदभाव के  बरक्स रखकर देखना चाहिए। भ्रूण हत्याएं, दहेज हत्याएं, खाप पंचायतें और महिलाओं के खिलाफ अनेक अलिखित नियम खत्म होने चाहिए। अंत में यह भी उल्लेख जरूरी है कि देश की पांचों शक्तिशाली महिलाएं अपनी सत्ता का इस्तेमाल हमेशा समझदारी से नहीं करती। 

इन महिलाओं की नेतृत्व शैली में आप कई तरह की खामियां ढूंढ़ सकते हैं। इनकी शक्ति किसी स्त्री राज के उदय का संकेत नहीं है। फिर भी एक महिला विरोधी समाज में उनकी इतनी शक्ति आश्चर्यजनक है। इनके उदय के चाहे जो कारण हों, लेकिन यह बात उल्लेखनीय है और प्रशंसनीय भी।

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  • Web Title:पांच शक्तिशाली महिलाओं की ताकत