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लादेन से दूर ही रही मुस्लिम बिरादरी

चर्चाएं तो कई तरह की हैं। कुछ तो यह मानने को भी तैयार नहीं कि ओसामा-बिन-लादेन सचमुच मारा गया है। कुछ कह रहे हैं कि उसकी मृत्यु पांच साल पहले अफगानिस्तान की पहाड़ियों में एक मुठभेड़ के दौरान हो गई थी। अभी अमेरिका और पाकिस्तान उसे मारने का सामूहिक नाटक कर रहे हैं। 

इन चर्चाओं से इतर विश्वभर के मुसलमानों की कहीं ज्यादा दिलचस्पी यह जानने में है कि अल कायदा सरगना के मारे जाने के बाद क्या दुनिया में मुसलमानों के प्रति रवैया और सोच बदलेगी? अमेरिका और यूरोपीय देशों में क्या अब मुसलमान शक की निगाहों से नहीं देखे जाएंगे? ओसामा के कारण दुनिया भर में मुसलमानों की छवि खराब हुई है।

अरबी अखबारों के स्तंभकार नासिर-अल-सरामी के मुताबिक, ओसामा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि उसकी वजह से दुनिया में मुसलमानों के लिए नफरत का माहौल बना। उसके बनाए आतंकी माहौल के चलते अपने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और बालीवुड के बादशाह शाहरुख खान को भी बदसलूकी झेलनी पड़ी थी। उसकी वजह से पिछले 10 सालों में इस्लामी देशों को भी कई रंग देखने पड़े हैं।

ओसामा और 9/11 के आतंकी हमले ने अमेरिका को भी खुलकर खेलने का मौका उपलब्ध कराया है। मुस्लिम बुद्धिजीवी कहते हैं कि वह कभी आम मुसलमानों का पसंदीदा नहीं रहा है। न ही उसके मरने पर किसी को     अफसोस है। जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति नजीब जंग मानते हैं कि हिन्दुस्तान के मुसलमानों ने तो उससे पूरी तरह दूरी बनाए रखी। उसकी मौत, हयात या उसके आतंकी आंदोलन में कभी इनकी दिलचस्पी नहीं रही। सऊदी अरब और मिस्र के मुफ्तियों के सरदार इब्ने हाज और यूसुफ अलकरवी उसके खिलाफ बहुत पहले फतवा जारी कर चुके हैं।

उससे मुलाकात करने वाले अखबारनवीसों में से एक पाकिस्तान के साऊद साहिर कहते हैं कि ओसामा ऐसे खौफ का नाम था जिसके आगमन पर आतंकी माहौल बनाने को हवा में अंधाधुंध गोलियां बरसाई जाती थीं। इतना जरूर है, अमेरिका और इजराइल कारनामों के चलते एक वर्ग विशेष में वह काफी चर्चित था। आम लोग साथ होते तो उसके मरने की खबर के साथ ही दुनियाभर में हंगामा हो जाता। मुस्लिम देशों ने तो उसके मरने पर प्रतिक्रिया देना भी जरूरी नहीं समझा। दुनिया के आलिमों ने उसकी लाश समुद्र में फेंकने पर जरूर ऐतराज जताया है। वह भी इसलिए कि इस्लाम में बुरे इंसान की भी लाश दफनाने का हुक्म है।

लोग यह भी मानते हैं कि ओसामा के मारे जाने भर से आतंकवाद का खात्मा नहीं होने वाला, इसलिए जरूरत है इसके स्थाई समाधान की। मुस्लिम बिरादरी चाहती है कि जिस सोच और परिस्थितियों के चलते आतंकी पैदा हो रहे हैं, सामूहिक प्रयास से उसे ही समूल नष्ट कर दिया जाए।

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