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अपनी आवाज सुनो

क्या सोचा था और क्या हो गया? जिंदगी में जहां वह थे, उसका सपना देख-देख कर तो बड़े नहीं हुए थे। बनना कुछ चाहते थे, बन कुछ गए थे। उनके भीतर एक सपना पलता रहा था, लेकिन शायद उन्हें अपने पर ही भरोसा नहीं था।

अक्सर हम अपने पर भरोसा नहीं कर पाते। डॉ. मिशेल वुडवर्ड मानती हैं कि अपने अंदर की आवाज पर भरोसा करना चाहिए। अगर हम कुछ करना चाहते हैं, तो उसके लिए बाहरी मुहर या समर्थन की जरूरत क्यों है? वह मशहूर करियर स्ट्रैटेजिस्ट हैं। दो गजब की किताबें उन्होंने लिखी हैं, ‘आई एम नॉट अ सुपरवूमेन : फर्दर ऐसेज ऑन हैप्पियर लिविंग’ और ‘गेटिंग अनस्टक: हाउ टू फिगर आउट व्हेयर यू वान्ट टू बी ऐंड गेट देअर।’

हमारे भीतर से आवाज आती है कि हमें यह करना चाहिए, लेकिन हमें भरोसा नहीं होता कि वह काम हम कर पाएंगे या नहीं। दरअसल, आवाज हमारे अंदर से आती है और हम बाहर से समर्थन चाहते हैं। कोई हमारी आवाज को समर्थन दे दे या सहमत हो जाए। कोई बाहर से भरोसा दे दे और हम काम पर निकल पड़ें। आखिरकार हमें अपने भीतर की आवाज पर भरोसा क्यों नहीं होता?

बुद्ध कहते हैं कि हम जो चाहते हैं, हो जाते हैं। लेकिन ऐसा वे ही कर पाते हैं, जो अपने भीतर का भरोसा करते हैं। वही जो अपने दीपक खुद होते हैं, वही दुनिया को जीतते हैं। असल में दुनिया को जीतना अपने को ही जीतना होता है। हम अपने होकर ही तो नहीं जी पाते।

अपने में जीने के मायने होते हैं, अपनी प्रकृति या स्वभाव के मुताबिक जीना। यह जान-समझ कर जीना कि हमारा स्वभाव क्या है? और हम अपने से क्या चाहते हैं? अगर हम अपनी आवाज की अनसुनी कर जीते हैं, तो दुखी होना हमारी नियति है। अपने स्वभाव से अलग जीकर हम खुश कैसे रह सकते हैं?.. तो अपनी आवाज सुनो न।                

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