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बर्बर विधायक को सजा

उत्तर प्रदेश के चर्चित मनोज गुप्ता हत्याकांड में बहुजन समाज पार्टी के विधायक शेखर तिवारी और 10 अन्य लोगों को सजा मिलने से उन लोगों को राहत मिलेगी जो राजनीति और प्रशासन में उगाही की संस्कृति के शिकार हैं। दरअसल जिला और राज्य स्तरीय राजनीति में इंजीनियर उगाही के सबसे बड़े शिकार होते हैं, क्योंकि आम धारणा यह है कि वे भ्रष्टाचार से बहुत पैसा कमाते हैं।

कई सारे इंजीनियर भ्रष्ट होते भी हैं, लेकिन उगाही की गाज ईमानदार इंजीनियरों पर ही गिरती है। लगभग ढाई साल में इस मुकदमे का फैसला हो जाना भी न्याय में लोगों के विश्वास को कुछ तो मजबूत करेगा, लेकिन इस मामले से हमारे देश में राजनीति और अपराध के गठजोड़ का भयानक चेहरा भी सामने आता है।

यह भी भयावह है कि अपराधियों में एक जनप्रतिनिधि है, जिसका काम कानून बनाना है और एक पुलिस अधिकारी है, जिसका काम कानून की तामील करना है। अगर कानून बनाने वाला और उसका पालन करवाने वाला ही जघन्य अपराध में साथ-साथ शामिल हो तो किससे कानून का राज कायम करने की उम्मीद की जा सकती है।

शेखर तिवारी का कोई खास राजनैतिक इतिहास नहीं है। उन्हें पहली बार विधायक के पद पर चुना गया है। वह राजनीति में आए उन नवधनाढय़ लोगों का उदाहरण है, जो किसी जायज राजनैतिक रास्ते से राजनीति में नहीं आए। ऐसे लोगों की राजनीति में भरमार है, जिन्होंने अच्छे-बुरे तरीके से पैसा कमाया और जो उस पैसे और बाहुबल की सहायता से पुराने किस्म के राजनैतिक लोगों को पछाड़ कर महत्वपूर्ण जगहों पर पहुंच गए।

इसमें जितना दोष उस राजनैतिक प्रक्रिया का है, जिसमें पैसे और बाहुबल के सहारे विधानसभा और लोकसभा के टिकट मिलते हैं, उतना ही दोष शायद उस जनता का भी  है, जो जाति, पैसे या छोटे-मोटे स्वार्थो के लिए ऐसे लोगों को चुनती है। यह आक्रामक, असंस्कृत और असामाजिक नवधनाढय़ वर्ग सारे देश की राजनीति में दिखाई देता है, किसी राज्य में इनकी उपस्थिति कम है, किसी राज्य में बहुत ज्यादा है।

इस तरह के लोग उतनी ही बेरहमी से उगाही करते हैं, जैसे शेखर तिवारी कर रहा था और उनकी मदद प्रशासन के वे लोग करते हैं, जो उगाही और दूसरे गलत कामों में उनके सहयोगी होते हैं, जैसे कि थानेदार होशियार सिंह ने किया। पैसा न देने के लिए इन लोगों ने मनोज गुप्ता की जिस तरह पिटाई की और उन्हें बिजली के झटके लगाए, वह किसी सभ्य समाज के सभ्य प्रतिनिधियों का नहीं, माफिया गिरोहों के अपराधियों जैसा काम है।

उत्तर प्रदेश में लगातार इस तरह से जनप्रतिनिधियों के संगीन अपराधों में लिप्त होने की खबरें आती रहती हैं, इसमें अच्छी बात यही है कि राजनैतिक तौर पर उन्हें बचाने की कोई खास कोशिश नहीं होती,  लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसे बर्बर और भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों और सरकारी कर्मचारियों का आतंक ऐसी कार्रवाइयों से खत्म होगा?

ऐसा लगता तो नहीं है क्योंकि लगातार ऐसी घटनाओं की खबरें आती रहती हैं और भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी लगातार निरंकुश होते जा रहे हैं। एक विश्व महाशक्ति बनने की राह पर चल रहे देश का इस प्रकार की अपसंस्कृति से तालमेल कैसे बैठेगा? उत्तर प्रदेश की जनता यही चाहती है कि उसे एक साफ-सुथरा और अपराधमुक्त प्रशासन और माहौल मिले, लेकिन इसका रास्ता यही है कि जाति, धर्म, पैसे जैसे संकीर्ण मुद्दों पर नहीं, बल्कि योग्यता के आधार पर वोट दिया जाए और राजनेताओं पर दबाव डाला जाए कि वे साफ-सुथरा प्रशासन दें। आखिरकार साफ-सुथरा और जिम्मेदार प्रशासन पाने का जनता का हक लोकतंत्र की मूल प्रतिज्ञाओं में से है।

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