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रंग भर दो मां के सपनों में

रंग भर दो मां के सपनों में

बचपन से अब तक आपकी हर ख्वाहिश को पूरी करने वाली आपकी मां। आपके लिए एक सुनहरे भविष्य का ख्वाब देखने वाली आपकी मां। आपको अस्तित्व देने वाली आपकी मां। पर, मां के भी तो सपने होंगे। वे सपने जिन्हें वो आज तक पूरा नहीं कर पाईं। अपनी प्यारी मां के छूटे ख्वाब और टूटे सपनों की किरचों को संवारना अब आपके हाथ में है। बता रही हैं जयंती रंगनाथन

हेमा मालिनी की मां जया चक्रवर्ती खुद एक अभिनेत्री बनना चाहती थीं। वह दौर अलग था। वे अपने दिल की बात अपने परिवार वालों तक को बता नहीं पाईं। छोटी उम्र में शादी हो गई और फिर आई उनकी जिंदगी में एक प्यारी सी गुड़िया—हेमा। जया ने तय किया कि वे अपनी बेटी को जीने के लिए एक विशाल आसमान देंगी। हेमा मालिनी को बहुत बचपन से मोहिनी आट्टम सिखाया। नृत्य की बारीकियों से परिचित करवाया। जब हेमा एक कामयाब अभिनेत्री बनीं, तब उन्होंने अपने एक साक्षात्कार में कहा था—मां ने मेरे सपनों को पूरा करने में अपनी जिंदगी बिता दी। जब वे साठ साल की हुईं, तो मैंने उनसे पूछा कि बताओ, तुम्हारे सपनों को मैं कैसे पूरा करूं? तो अम्मा हंस कर बोलीं- मैंने अपने लिए कोई सपना देखा ही नहीं। जो कुछ देखा, तुम्हारे लिए ही देखा। हेमा मालिनी ने भी वही किया, जो सालों पहले उनकी मां ने उनके लिए किया था। वे अपनी बेटियों की महत्वाकांक्षाओं में रंग भर रही हैं।

मांएं अक्‍सर ऐसा करती हैं। अपने बच्चों के लिए एक सुनहरे कल का सपना देखती हैं और उनके सपनों को पूरा करने के लिए अपना आज दांव पर लगा देती हैं। अपना करियर, अपने शौक, अपनी जिंदगी को एक कोने में सरका कर वे सिर्फ और सिर्फ अपने बच्चों के लिए जीने लगती हैं। उनकी आंखों में बस एक ही सपना रह जाता है—मेरी बेटी खूब पढ़े-लिखे, उसे अच्छी नौकरी मिले। उसकी शादी ऐसे घर में हो, जहां उसे दुनिया भर की खुशियां मिल सकें।

बेटियां हंसती-खिलखिलाती कब मां के सपनों से निकल अपनी दुनिया बसा लेती हैं, पता नहीं चलता। पर मां फिर भी अपनी चाहत बनाए रखती है। बेटी को खुशहाल देखना, नौकरी में आगे बढ़ते देखना, नाती-पोतियों वाला बन नानी-दादी की नई भूमिका में पूरी तरह रम यह भूल जाती हैं कि कभी उनके भी अपने कुछ शौक थे। कभी चाहा था कि संगीत सीखूं, फरीदा खानम की गजल आज जाने की जिद ना करो सुर में गा पाऊं। गाड़ी चलाना सीखूं, बंजी जंपिंग करूं, देश-विदेश घूमूं।

रेडियो जॉकी श्रृति शर्मा को हाल-फिलहाल पता चला कि कभी उसकी मां सितार बजाया करती थीं। श्रृति ने पुराने एल्बम में मां के कॉलेज के वार्षिक समारोह की तसवीर देखी। दुबली-पतली श्रृति की मां मग्न हो कर सितार बजा रही थीं। श्रृति कहती हैं, मां के लंबे बाल एक ढीली ढाली चोटी में बंधे लापरवाही से सामने की तरफ झूल रहे थे। चूंकि फोटो ब्लैक एंड वाइट थी, उनकी साड़ी का रंग तो समझ नहीं आया, पर डार्क कलर की चैक वाली साड़ी में मां बेहद कमसिन लग रही थीं। इस बात को कई साल बीत गए। लेकिन श्रृति ने जब मां से कहा कि उन्हें अपना पुराना शौक बरकरार रखना चाहिए, तो मां की आंखों में आंसू आ गए। वे बस इतना बोल पाईं, मैं तो भूल ही गई थी कि मुझे सितार बजाने का शौक था। श्रृति ने अपनी सैलरी से मां को सितार खरीद कर दिया, यही नहीं सितार की क्लास में दाखिला दिलवाया। वो बताती हैं, ‘मैं अपनी मां में गजब का परिवर्तन देख रही हूं। वे पहले से कहीं ज्यादा खुश रहने लगी हैं। स्लिम हो गई हैं। खूब अच्छे से सज कर क्लास जाती हैं और अक्‍सर बैठक में सितार पर कोई धुन बजाती दिखती हैं।’

सिर्फ एक बेटी ही अपनी मां को उनकी खोई जिंदगी लौटा कर उनमें दोबारा हौसला भर सकती हैं। मां की खोई खुशियां कुछ भी हो सकती हैं- लेखन, पेंटिंग, एडवेंचर, बैडमिंटन, कंप्यूटर सीखना और दूर बैठे अपने बच्चों से फेसबुक पर चैटिंग करना.. मां अपना पुराना शौक या चाहत दिल के किसी कोने में दफन कर चुकी होंगी, लेकिन जब उन्हें अपनी चाहत को जीने का मौका मिलेगा, उनकी जिंदगी रंगों से भर जाएगी।

स्मिहा भारती अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, ‘मेरी मां ने अकेले ही मुझे पाल-पोस कर बढ़ा किया। मैं बस साल भर की थी, जब मेरे पापा गुजर गए। मां ने दोबारा शादी नहीं की, मेरी खातिर। जिन दिनों मेरी शादी होनी थी, मैंने महसूस किया कि मां बात-बात पर रोने लगती थीं। मुझे पता था कि मेरे जाने के बाद वे बेहद अकेली पड़ जाएंगी। मैंने उनसे ना जाने कितनी बार कहा कि वे हमारे साथ ही रहें, मेरे ससुराल वालों को भी एतराज नहीं था। पर मां इसके लिए तैयार नहीं थी। कुछ महीने बाद मैं जब मां से मिलने गई तो मैंने सजेस्ट किया कि उन्हें घर में अपने साथ कुछ पेइंग गेस्ट रख लेने चाहिए। मां को आइडिया जम गया। आज मां के साथ तीन पेइंग गेस्ट लड़कियां रहती हैं और मां का समय मजे में कट जाता है।’

मनोवैज्ञानिक डॉक्टर उमा बनर्जी भी स्मिहा की बात से सहमत हैं। वे कहती हैं, ‘बेटी जैसे-जैसे बड़ी होती है और अपनी दुनिया में रमती चली जाती है, मां के अंदर अकेलापन घर करने लगता है। कई बार बेटियों को मां के इस अकेलेपन का अंदाजा भी नहीं लगता। पर, बेटियां ही तो मां की हमदर्द और दिल के करीब होती हैं। यही वो उम्र है, जब औरत का शरीर कुदरत के फैसले के आगे बेबस होता चला जाता है। मेनोपॉज की दुरूह प्रक्रिया उसके तन-मन को झिंझोड़ देती है। ऐसे में अगर बेटियां आगे आ कर मां को एक बार फिर सपने देखने का मौका दें, तो मां को जैसे संजीवनी मिल जाती है। वो फिर से एक नई जिंदगी जीने लगती हैं।’

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