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मां के साथ सैर-सपाटा

मां के साथ सैर-सपाटा

मां-बेटी का रिश्ता शायद दुनिया में सबसे प्यारा रिश्ता होता है। हर चीज का मजा मां के साथ बढ़ जाता है। फिर चाहे वह सैर-सपाटा ही क्यों न हो। बता रही हैं सुनीता तिवारी

घूमना-फिरना किसे पसंद न होगा। घूमने का मजा तब दोगुना हो जाता है, जब आपको कम्पनी देने वाले लोग आपकी भावनाओं को समझों, कुल मिलाकर जिनके साथ घूमते हुए आप बोझिल न होकर पूरी तरह सहज महसूस करें। कुछ माह पूर्व अचानक ही सिंगापुर व मलेशिया घूमने का प्रोग्राम बन गया, वह भी मां के साथ। मैं तो सिंगापुर-मलेशिया की सैर के बारे में सोचकर ही रोमांचित हो उठी। बस, जल्दी-जल्दी में तैयारी की। आनन-फानन में हम घूमने के लिए निकले। सच पूछो तो एयरपोर्ट पर पहुंचते-पहुंचते रोमांच कहीं खोने लगा और मन में एक डर सा लगने लगा। और फिर मैं खुद को ही कोसने लगी कि बैठे-बैठे यह क्या सूझी कि हम दोनों मां-बेटी पराए मुल्कों की सैर पर निकल पड़ीं। हम न उन देशों की करेंसी से परिचित हैं, न वहां की जगहों से, ऐसे में घूमना-फिरना क्या खाक होगा। पर एयरपोर्ट पर लगेज चेक होने के बाद एक आत्मविश्वास जागने लगा था। मां मेरी हिम्मत बढ़ाते हुए कहने लगीं कि आज इन्सान चांद पर पहुंच चुका है और हम क्या सिंगापुर तक भी नहीं जा सकते। अपनी मां जो कि घरेलू महिला हैं, उनके मुंह से यह सब सुनकर हिम्मत दोगुनी होनी ही थी।

मलेशिया से फ्लाइट बदलकर हम सिंगापुर पहुंच गए। फ्लाइट से लेकर वहां पहुंचने तक पूरे रास्ते हमें नवविवाहित जोड़े ही जोड़े दिखते गए। ऐसे में हम मां-बेटी ने भी घर और घर के सदस्यों से दूर घूमने आने का भरपूर लुत्फ उठाया। सुबह होटल में हम पेट भरकर ब्रेक फास्ट करते। कुछ मम्मी अपनी प्लेट में नया लेकर आतीं तो मैं चखने लगती। मैं कुछ नया लाती तो मम्मी चटखारे लेने लगतीं। दिन भर बिल्कुल ऐसे घूमते जैसे वहां हमारे लिए कोई नई जगह न हो। कभी कहीं सड़क किनारे चाय पीने रुकते, तो कभी स्टार बग कॉफी पीते। रास्ता पूछने के लिए कभी किसी से सहायता मांग लेते, तो कभी किसी से। जिस मुल्क में हम पहली बार गए थे। कोई पुरुष हमारे साथ नहीं था, वहां हम दोनों रात बारह बजे भी घूमकर होटल सुरक्षित पहुंचे। न किसी की रोक, न किसी की टोक। सफारी पार्क, संटोसा, मरलॉयन, डक बोर्ट, जोहान्सबर्ग बर्ड पार्क, ट्विन टॉवर, बातू केव घूमने के अलावा मलेशिया में एक खेल कंपिटीशन में भाग लेकर इनाम भी जीता। वहां के स्थानीय निवासियों के लिए हमारा मां-बेटी का दूसरे मुल्क से आकर इस तरह घूमना कुछ अचंभे की बात थी। मेरे कंधे पर टंगा भारी बैग और गले में टंगा कैमरा इतना तो बता ही देता था कि हम टूरिस्ट हैं। हैरान-परेशान से कुछ लोग तो हिम्मत कर पूछ ही लेते थे, कहां से आए है? पता चलने पर कि हम भारत से घूमने आए हैं। हम मां-बेटी हैं सुनकर अधिकतर लोगों के मन में एक अलग ही इज्जत के भाव आ जाते थे। कुछ स्थानीय महिलाएं तो कभी मेरे चेहरे पर हाथ फेरकर प्यार देतीं। कभी सिर और पीठ पर थपकी मिलती। कभी वे महिलाएं मां का हाथ दबाते हुए कहतीं—‘‘आप बहुत किस्मत वाली हैं। दूसरे मुल्क से अपनी बेटी के साथ घूमने आई हैं। हमारे यहां के बच्चे दोस्तों के साथ घूमते हैं, हमारे बच्चे इतनी दूर तक कम्पनी शायद कभी न दें। ’’ मां की खुशकिस्मती देख कुछ महिलाओं की आंखें छलकती भी मैंने देखीं। तब मैंने दिल से दुआ मांगी। काश कुछ ऐसा हो जाए इनके बच्चे भी इनके साथ दूर-दूर तक घूमने जाएं। मां के साथ सैर का मजा तो भई सैर पर जाने के बाद ही आएगा। तब वह भी मेरी तरह हमेशा रह-रहकर उन दिनों को याद कर रोमांचित होंगे।

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