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अब घर में नहीं ‘ललना’ स्कूल में ही ‘पालना’

अब घर में नहीं ‘ललना’ स्कूल में ही ‘पालना’। बिहार में नन्हें बच्चों की शिक्षा का यह नया कांसेप्ट बड़ी तेजी से पनप रहा है। ठुमककर चलना सीख रहे बच्चे जरा सा संभलकर खड़े होते हैं कि प्ले स्कूल के दरवाजे उनके लिए खुल जाते हैं।

खास बात यह है कि इसपर न तो किसी का जोर है और न जबरदस्ती। बल्कि यह नई पीढ़ी के अभिभावकों की चाहत बन रही है और प्ले स्कूल में अपने बच्चों को दाखिल करवाने की होड़ मची है। बच्चे पांच साल के बाद ही स्कूल जाएंगे यह सोच अब पुरानी हो चुकी है। माता-पिता अब ‘टू इयर प्लस’ वाले माइंडसेट के साथ बच्चों के शैक्षणिक परवरिश की योजना बना रहे हैं। ‘टू इयर प्लस’ का कांसेप्ट ही प्ले स्कूल का आधार है।

ऐसे स्कूलों में खेल-खेल में ही बच्चों के भविष्य की बुनियाद रखी जानी शुरू हो जाती है। बच्चों का डेढ़ से दो घंटे का यह समय मां की आंचल से दूर टीचर के साथ बीतता है।

क्यों आया यह बदलाव
इस बदलाव के कई कारण भी सामने आ रहे हैं। एक कारण तो यह बताया जा रहा है कि अब संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और न्यूक्लीयर फैमिली कांसेप्ट तेजी से बढ़ रहा है। यानी अब बच्चों का बचपन दादा-दादी, चाचा-चाची के बीच नहीं बल्कि घर में सिर्फ अपनी मम्मी और डैडी के साथ बीत रहा होता है। जो संस्कार बच्चों को संयुक्त परिवार में मिल जाते थे अब शायद अनुभवहीन न्यूक्लीयर फैमिली में उसका आभाव है।

कंपीटीशन
मां-बाप में तेजी से यह चाहत बढ़ रही है कि अगर उनके पड़ोसी का बच्चा प्ले स्कूल में जा रहा है तो उनका क्यों नहीं। दूसरों की तरह उनका बच्चा भी हर तरह से कंपीट करे। उनकी सोच इस तरफ भी है कि अगर अभी से ही उनके बच्चे को सही दिशा मिल जाए तो आगे चलकर बड़े स्कूलों में दाखिले में परेशानी कम होगी।


पेसेंस
प्ले स्कूल में छोटे बच्चों के दाखिले का एक बड़ा कारण न्यूक्लीयर फैमिली के मां-बाप में पेंसेंस की कमी को भी माना जा रहा है। घर में उनके अलावा दूसरा कोई नहीं होता जो बच्चों को समय दे सके और यही थका देने वाली दिनचर्या उन्हें प्ले स्कूल की ओर खींचती है।

बच्चों का मानसिक स्तर
यह भी माना जा रहा है कि आज कल के बच्चे का पहले के बच्चे की तुलना में अधिक विकसित है। वे चीजों को जल्दी-जल्दी सीखते हैं।

बच्चों में बनती है आदत
प्ले स्कूल में बच्चों को भेजने के पीछे एक बड़ा कारण बच्चों में स्कूल मैनिया को दूर करना भी है। माना जाता है कि दो साल-ढाई साल के बच्चों में स्कूल जाने की आदत बनती है और आगे चलकर यही आदत बरकरार रहती है।

प्ले स्कूल के सकारात्मक पक्ष
बच्चों को उन सब तौर-तरीकों को बताया और सिखाया जाता है जो आगे चलकर सामाजिक परिवेश में घुलने-मिलने में सहायक होते हैं। मसलन बड़ों का अभिवादन कैसे करना है। बातचीत का तौर तरीका। फिजिकल स्मार्टनेस और कई तरह की चीजें हैं। कई प्ले स्कूल हैं जिनके पास इसके लिए बाकायदा सिलेबस होता है। ऐसे स्कूलों में बच्चे सहज होते हैं।

नकारात्मक पक्ष
प्ले स्कूल के नाम पर ऐसे कई स्कूल खुल चुके है। ऐसे स्कूलों के पास कोई सिलेबस नहीं होता। दो-चार दिन बच्चों के साथ खेलने कूदने के बाद वे उन्हें ‘क, ख, ग, घ और ए, बी, सी, डी पढ़ना शुरू कर देते हैं। इसका बच्चों पर प्रतिकूल असर भी पड़ता है।

ब्रांडेड प्ले स्कूल
बिहार में किडजी, यूरो कीड, सेमरॉक, बचपन, आई प्ले आई लर्न, रूट्स टू विंग, लिटरा कीड जैसे स्कूल हैं जिनकी कई शाखाएं भी हैं।

अन्य प्ले स्कूल
फाउंडेशन, स्प्रिंग पेटल, मदर्स प्राइड, लिटिल एंजल और कई स्कूल हैं। बिहार में करीब दो सौ प्ले स्कूल हैं।

क्या है फीस
सामान्यत: प्ले स्कूल की एडमिशन फीस और ट्यूशन फीस मिलाकर 14 से 15 हजार रुपए सालाना होती है। औसत कितने बच्चे हर साल प्ले स्कूल से जुड़ते हैं

मोटे तौर पर यह माना जाता है कि औसतन हर साल करीब 20 हजार बच्चे प्ले स्कूल से जुड़ते हैं। इसमें 50 फीसदी बच्चे वैसे होते हैं जिनका माता-पिता बड़े अफसर, बिजनेस मैन या फिर दूसरे व्यवसाय से जुड़े होते हैं। 25 फीसदी बच्चे के माता-पिता मध्यवर्ग से आते हैं और 25 फीसदी निम्न मध्य वर्ग से आते हैं।

प्ले स्कूल के संचालकों की राय
प्ले स्कूल के कांसेप्ट को पटना में लेकर आए और किडजी के संचालक अमित प्रकाश कहते हैं कि मूलत: प्ले स्कूल का कांसेप्ट बच्चों के शारीरिक विकास और संस्कार को विकसित करने को लेकर ही बना है। प्ले स्कूल की तरफ बढ़ रहे रूझान का एक बड़ा कारण यह भी है कि मां-बाप का पेसेंस खत्म हो रहा है और बच्चों का मानसिक स्तर बढ़ा है।

यूरो किड की प्राची शर्मा कहती हैं कि यह पॉजीटिव है। जो माता-पिता अकेले रहने की वजह से बच्चों को संयुक्त परिवार में मिलने वाला संस्कार नहीं दे पाते वह प्ले स्कूल में बच्चे सीख जाते हैं। उनकी राय है कि एक महीने से पांच साल तक का बच्चा जितनी तेजी से चीजों को सीखता है वह पांच साल के बाद उतनी तेजी से नहीं सीख पाता।

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