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ये कैसा स्वागत

घर में खुशी का माहौल था। नई दुल्हन आने वाली थी। घरवाले पलक पावड़े बिछाए थे। जैसे-तैसे इंतजार की घड़ियां खत्म हुईं। धूम-धड़ाके के साथ नए मेहमान को डय़ोढ़ी के अंदर लाए। लेकिन यह क्या? जिस आंगन में बहुरिया घूमेगी, उसी के बारे में सोचना भूल गए।

बेचारी नई-नवेली! न जाने कब पैर में मोच आ जाए और कब कमर में बल पड़ जाए। इस दुल्हन और क्लस्टर बस सेवा की किस्मत एक जैसी नहीं लगती? ऐसी बसों के लिए सड़कों को दुरुस्त नहीं करना था? या आप मानते हो कि दिल्ली का आंगन चंद किलोमीटर में बसे पॉश इलाकों तक ही है?

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