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राज्यपाल चाहें तो अध्यादेश पर तत्काल ले सकते हैं फैसला

सरकार ने अध्यादेश की ‘गेंद’ राज्यपाल के पाले में डाल दी है। राज्यपाल चाहें तो सरकार के प्रस्ताव को तत्काल स्वीकार कर इसे मंजूरी दे सकते हैं। अन्यथा संवैधानिक तरीके से वह अध्यादेश पर फिर से विचार के लिए सरकार को वापस कर सकते हैं। अब देखना यह है कि राज्यपाल इसे कब तक मंजूरी देते हैं और लोगों को कब राहत मिलती है।

20 दिन लगे अध्यादेश लाने में: मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने 15 अप्रैल को अध्यादेश लाने की घोषणा की थी। 18 अप्रैल को कैबिनेट में अध्यादेश लाए जाने की उम्मीद थी, लेकिन सरकार ने अदालत में पक्ष रखने का फैसला लिया और फिर पुनर्वास नीति बनाने के लिए समिति का गठन और अध्यादेश बनाने का निर्देश दिया गया।
पुनर्वास नीति के प्रारूप को 30 अप्रैल को कैबिनेट से सैद्धांतिक मंजूरी मिली। सरकार ने 5 मई को राज्यपाल के पास अध्यादेश भेजा।

मंजूरी में कितना समय लगता राज्यपाल के यहां: सूत्रों के मुताबिक यह मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। अत्यावश्यक मामलों में राज्यपाल द्वारा तत्काल फैसला ले कर सरकार को फाइल लौटाया गया है। कानूनी सलाह के लिए विशेष कार्य पदाधिकारी (न्यायिक) भी राज्यपाल सचिवालय में होते हैं।

क्या कहते हैं जानकार: रांची विश्वविद्यालय के राजनीतिक विज्ञान के पूर्व विभागाध्यक्ष आरके झा ने कहा कि जब सत्र बुलाना तत्काल संभव न हो और कानून बनाना आवश्यक हो, तभी सरकार अध्यादेश लेकर आती है। राज्यपाल कितने दिन में मंजूरी देने के लिए बाध्य हैं, इसकी कोई संवैधानिक व्याख्या नहीं है। अध्यादेश अपने आप में त्वरित कार्रवाई का सूचक है। लिहाजा राज्यपाल तत्काल फैसला नहीं लेते हैं तो सवालिया निशान तो लगता ही है।

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