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देवसत्ता के दर्शन के लिए आइये चार धाम

देव संस्कृति में तीर्थयात्रा अंतर्जगत में परिवर्तन का प्रमुख माध्यम मानी गई है। तीर्थ का अर्थ है दिव्य स्थान। वास्तव में प्राचीन काल में तीर्थ का दिव्य वातावरण, वहां विद्यमान ऋषि-मुनियों की वाणी के माध्यम से निकलने वाली ज्ञान की गंगा और साधक के हृदय में उपस्थित भक्ति उसके जीवन को नई दिशा देती थी। 

तीर्थयात्रा केवल आध्यात्मिक अर्थो में ही महत्त्वपूर्ण नहीं थी, बल्कि सामाजिक व राष्ट्रीय अर्थो में भी महत्त्वपूर्ण थी। उत्तराखंड की यह देवभूमि इतनी सुंदर व पवित्र है कि इसका कोई सानी नहीं। हिमालय के इस भाग में दिव्यता भी है और सूक्ष्म रूप में देवसत्ताएं भी विद्यमान हैं।

वेदों जैसे पवित्र : चार धाम
ज्ञान की उपासक रही हमारी देव संस्कृति में प्रारम्भ से ही चार धामों के प्रति अपार श्रद्धा रही है। जिस प्रकार चारों वेदों के मंत्रों में ईश्वर का वास माना गया है, उसी प्रकार चारों धामों में भी भक्तजनों को ईश्वरत्व की सहज ही अनुभूति होती है।

यूं तो चार धाम राष्ट्र के चारों कोनों पर स्थापित जगन्नाथ, रामेश्वरम्, द्वारिका और  बद्रीनाथ को कहा जाता है। इन चारों में से एक बद्रीनाथ धाम उत्तराखंड में स्थित है। उत्तराखंड के प्रमुख तीर्थो को ‘धाम’ कहा जाता रहा है। यहां  बद्रीनाथ,  केदारनाथ, गंगोत्री और  यमुनोत्री नामक चार धाम स्थित हैं, जिनका दर्शन करने के लिए प्रतिवर्ष देश-दुनिया के लाखों-लाख श्रद्धालु देवभूमि में आते हैं और चार धाम यात्रा करके यहां के पवित्र तीर्थो का दर्शन करते और पुण्यलाभ प्राप्त करते हैं।

बद्रीनाथ धाम
बदरी शब्द ‘ब’ एव ‘दरी’ शब्दों के संयोग से बना है। ब का अर्थ है- परमात्मा और दरी का मतलब- गुहा। अर्थात् बद्रीनाथ वह स्थल है, जहां परमतत्व की चेतना घनीभूत हो उठती है। देवभूमि उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित बद्रीनाथ का मन्दिर भगवान विष्णु व उनके अवतार नारायण को समर्पित है। इस तीर्थ की महिमा कई पौराणिक ग्रंथों में मुक्तकंठ से गायी गई है।

महाभारत व पुराणों में बदरीवन, बद्रिकाश्रम तथा विशाला नाम भी मिलते हैं। पन्द्रह मीटर ऊंचे बद्रीनाथ मन्दिर का वर्तमान स्वरूप आदि शंकराचार्य जी की देन है। देवात्मा हिमालय में सप्तबदरी स्थित हैं, जिन्हें ध्यान बदरी, वृद्घ बदरी, भविष्य बदरी, योग बदरी, आदि बदरी, नृसिंह बदरी कहा जाता है। महर्षि व्यास ने यहीं पर पुराण लेखन किया था।

केदारनाथ धाम
आदिदेव शिव कला के भी देवता हैं। भगवान महादेव को समर्पित प्राचीन केदारनाथ मन्दिर आस्था के साथ कला के रूप में भी  प्रसिद्ध  है। बारह ज्योतिर्लिंगों में एक ‘केदारनाथ’ भी हैं। ऋषि उपमन्यु ने भी यहां कठोर तप किया। महाभारत के बाद पाण्डव भी यहां तप करने आए थे।

ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार राजा केदार ने यहां तपस्या की, जिससे इसका नाम केदारनाथ पड़ा। शंकराचार्य जी ने 32 की आयु में यहीं तपस्या में अपना शरीर त्यागा था। महात्मा गांधी का अस्थि विसर्जन इसी सरोवर में किया गया। मन्दिर के निर्माण में यांत्रिक सहायता के बिना विशालकाय पाषाण खण्डों का हुआ उपयोग मानवीय श्रम और कौशल का चमत्कार है।

गंगोत्री धाम
संस्कृति का जीवनस्रोत है- गंगोत्री। गोमुख आजकल गंगोत्री से 14 किमी आगे है, किन्तु प्राचीनकाल में वह गंगोत्री में ही था। विशाल भागीरथ शिला यहीं पर है, जहां भागीरथ जी ने तप किया था और गंगाजी को धरती पर आने के लिए सहमत किया था। गंगोत्री से कुछ ही दूरी पर चीड़ के वृक्षों का वन ‘चीड़वासा’, भोजपत्रों के वृक्षों का वन ‘भोजवासा’ तथा फलों का वन ‘फूलवासा’ स्थित है। 

भागीरथ ने जल दुर्भिक्ष के निवारण के लिए कठोर तप करके गंगा को स्वर्ग से धरती पर लाने में सफलता प्राप्त की थी। गंगा उन्हीं के तप-पुरुषार्थ से अवतरित हुईं, इसीलिए भागीरथी कहलाईं। लोकमंगल के प्रयोजन हेतु प्रचण्ड पुरुषार्थ करके भागीरथ दैवी कसौटी पर खरे उतरे और भगवान शिव के कृपापात्र बने।

यमुनोत्री
उत्तरकाशी जिले से 171 किमी उत्तर में 3,291 मीटर की ऊंचाई पर वर्ष भर बर्फ से ढका पर्वत शिखर है- बन्दरपूंछ। इसी पर्वत के पश्चिमी किनारे पर है- मां यमुना का उद्गम स्थल ‘यमुनोत्री’। यमुना को सूर्यपुत्री भी कहा जाता है। यमुनोत्री मन्दिर का निर्माण 1850ई़  में राजा सुदर्शन शाह ने कराया था। निकटवर्ती तीर्थस्थलों में सूर्यकुण्ड, दिव्यशिला, हर की दून, हनुमान मन्दिर आदि प्रमुख हैं। यमुनोत्री महर्षि परशुराम की तपस्थली रही है। यहीं से प्राप्त तपशक्ति से उन्होंने  अनीति में लिप्त आतताइयों को नष्ट किया था। ऋषि परशुराम ने अपने जीवन के उत्तरार्थ में ‘परशु’ अर्थात् फरसे को त्याग कर ‘फावड़ा’ थामा था और वृहद् वृक्षारोपण करके पर्यावरण संरक्षण आन्दोलन का अनूठा सूत्रपात किया था।
(लेखक देवसंस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार के कुलपति हैं)

प्रशिक्षण शिविर
तीर्थ सेवन का इन दिनों प्रचलित अर्थ ‘दर्शन’ मात्र रह गया है। प्राचीन काल में तीर्थ दर्शन का प्रयोजन उन दिव्य स्थानों में बने हुए, प्राण-चेतना उभारने वाले प्रशिक्षण-पाठ्यक्रमों का लाभ प्राप्त करना था। गायत्रीतीर्थ शान्तिकुंज के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा ने  इस पर गहन चिन्तन किया और एक व्यावहारिक वातावरण हरिद्वार स्थित गायत्रीतीर्थ शान्तिकुन्ज में विनिर्मित किया। यहां चलने वाले विभिन्न प्रशिक्षण शिविर तीर्थ सेवन की सार्थकता सिद्ध करते हैं।

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