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शंकर की अद्भुत मातृसाधना

ब्रह्मचारी शंकर घर में रहकर भी अध्ययन और अध्यापन में तत्पर रहते थे, परंतु उनकी मातृसेवा ही उनकी  सर्वप्रधान दिनचर्या तथा श्रेष्ठ साधना थी। उनके जीवन में मातृसाधना के अनेक अद्भुत प्रसंग देखने को मिलते हैं। 

एक प्रसंग में, प्रतिदिन आलवाई नदी में स्नान को जाने वाली उनकी धर्मनिष्ठ मां विशिष्टा देवी को लौटने में देर हो गई। पुत्र को चिंता हुई। वे मां को खोजने लगे। देखा मां अचेत पड़ी है।

शंकर मां की सेवा में लग गए और मां को घर ले आए। पर अपनी मां की उस हालत को देख शंकर इतने व्यथित हो गए कि वे दिन-रात श्रीभगवान् के चरणों में प्रार्थना करने लगे, हे प्रभु आप सर्वशक्तिमान हैं, आप सब कुछ कर सकते हैं। आप नदी को मेरे घर के पास ला दीजिए, ताकि मां को दूर जाने का कष्ट न हो।

शंकर जबकि महान पंडित थे, सर्वशास्त्र पारंगत थे, पर मां के दुख को देखकर अधीर हो गए। स्वयं विशिष्टादेवी पुत्र के इस आचरण से विस्मित थी। उन्होंने पुत्र को समझाया भी, पर वे नहीं मानें, उनकी आराधना चलती रही। शंकर की प्रार्थना से विचलित होकर आखिरकार प्रभु ने इसका प्रबंध कर दिया। उस साल की वर्षा में ही नदी की गति का परिवर्तन हो गया। 

इसी तरह संन्यास के लिए मां से आज्ञा लेने का विवरण भी कम मार्मिक नहीं है। विशिष्टादेवी का एकमात्र अवलंबन शंकर ही थे। शंकर के हृदय में संन्यास की तीव्र आकांक्षा थी, वे अद्वैत ब्रह्मज्ञान हासिल करना चाहते थे। पर मां से आज्ञा मिलना आसान नहीं था। अनेक तरह से समझाया, पर शंकर जी की ईश्वरीय इच्छा  के सामने मां की इच्छा पराजित हो गई।                  

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