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अगली पंचवर्षीय योजना के मुहाने पर

हाल ही में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 12वीं पंचवर्षीय योजना के मुद्दे तय करने के लिए योजना आयोग की पूर्ण बैठक की अध्यक्षता की। 11वीं पंचवर्षीय योजना का यह आखिरी साल है और एक अप्रैल 2012 से शुरू होकर साल 2017 तक चलने वाली 12वीं पंचवर्षीय योजना ही अब हमारी पूरी आर्थिक रणनीति तय करेगी।

कई आलोचक मानते हैं कि 12वीं पंचवर्षीय योजना पहली पंचवर्षीय योजना का महज 12वां संस्करण भर होगी! क्योंकि गरीबी, बीमारी, कुपोषण, अशिक्षा और बेरोजगारी अब भी बदस्तूर कायम हैं। वास्तव में, जब कभी भी बड़े वायदे किए जाते हैं और कोई नया नजरिया सामने रखा जाता है, तो इस तरह के संशयवाद उभरते ही हैं। 

वैसे, यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप विकास के मानदंडों को किस रूप में देखते हैं। अगर सकारात्मक दृष्टि से देखें, तो योजना आयोग ने मजबूती के साथ कहा है कि पिछले पांच वर्षो से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर औसतन 8.2 प्रतिशत रही।

हालांकि लक्ष्य नौ प्रतिशत का था, लेकिन पिछले रिकॉर्डो और विश्व के आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए यह एक सराहनीय उपलब्धि है। और इस समावेशी विकास में न सिर्फ गरीबों की संख्या में आई कमी शामिल है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक रूप से वंचितों व अल्पसंख्यकों के उत्थान से जुड़ी कामयाबियां भी शामिल हैं।

हालांकि योजना आयोग के लोग सभी क्षेत्रों में तरक्की की बात मानते हैं, लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि गरीबी को छोड़कर अन्य सहस्नब्दी विकास लक्ष्यों को भारत हासिल नहीं कर पाएगा। और यही वह पृष्ठभूमि है, जिसके कारण 12वीं पंचवर्षीय योजना में औसतन नौ प्रतिशत की विकास दर हासिल करने की जरूरत है और न सिर्फ इस दर की गति तेज करने की आवश्यकता है, बल्कि विकास को अधिक समावेशी व पर्यावरण के लिहाज से वहनीय बनाने की भी दरकार है।

बहरहाल, आठ महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं, जिनकी तरफ तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। पहली चुनौती है सेंट्रल स्पॉन्सर्ड स्कीम्स (सीएसएस) यानी केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का पुनर्गठन। जिस तेजी से केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं की संख्या बढ़ रही है, वह गंभीर चिंता की बात है। साल 2005 में राष्ट्रीय विकास परिषद की 51वीं बैठक में प्रस्ताव पारित करके योजना आयोग से यह कहा गया था कि वह एक विशेषज्ञ समिति गठित करे, जो केंद्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं का पुनर्गठन कर सके। पर सीएसएस की संख्या लगातार बढ़ती ही गई और इस वक्त तो केंद्रीय योजनाओं की संख्या करीब 139 तक हो गई है।

इन योजनाओं का पुनर्गठन लंबे समय से लंबित है और 12वीं पंचवर्षीय योजना वह सुअवसर है, जब इस दिशा में पहल की जाए। सीएसएस के मौजूदा स्वरूप में सुधार करते हुए वर्तमान योजनाओं को उनकी राशि समेत राज्यों के हवाले किए जाने की जरूरत है। उन योजनाओं को भी राज्य योजना का हिस्सा बनाया जाना चाहिए, जो खास स्थानीय जरूरतों के आधार पर शुरू की गई हैं। उस मद में केंद्र द्वारा दी जाने वाली राशि की निगरानी कराई जा सकती है। वैसे भी, इस तरह की योजनाओं के लिए जिन संसाधनों से धन मुहैया कराया जाता है, वे मूलत: राज्यों के ही संसाधन हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती है बुनियादी सुविधाओं की कमी को दूर करना। बुनियादी ढांचागत सुविधाओं की उपलब्धता किसी भी विकास की धुरी होती है, इसलिए न सिर्फ सड़क और बिजली जैसी आधारभूत संरचना के विस्तार की जरूरत है, बल्कि इनके बदले में चुकाए जाने वाले शुल्क को भी वहन करने लायक व विश्वसनीय बनाने की आवश्यकता है। पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी के लिए आकर्षक परिवेश बनाने की दिशा में भी काम करना होगा।

ऊर्जा के क्षेत्र में अब भी काफी समस्याएं दिखाई पड़ती हैं। 11वीं पंचवर्षीय योजना में 78,577 मेगावाट अतिरिक्त विद्युत उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन अब तक 50,000 मगावाट से अधिक अतिरिक्त बिजली का उत्पादन नहीं हो सका है। ऊर्जा क्षेत्र जितनी चिंताजनक स्थिति किसी अन्य नीतिगत क्षेत्र की नहीं है। चूंकि निवेश को आकर्षित करने व हमें प्रतिस्पद्र्धी बनाने वाले अन्य क्षेत्रों के मूल में भी ऊर्जा क्षेत्र की केंद्रीय भूमिका है, इसलिए इस पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।

हम जिस ऊंची विकास दर को हासिल करने की इस समय बात कर रहे हैं, वह तब तक मुमकिन नहीं है, जब तक कि इन्फ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए हम निजी निवेश को आकर्षित नहीं करते। भारत की ऊंची विकास दर की कुंजी यही है। फिर ऊर्जा क्षेत्र की न सिर्फ हमें क्षमता बढ़ानी होगी, बल्कि यह भी ध्यान में रखना होगा कि यह कम से कम कार्बन उत्सजर्न करने में सक्षम हो।

तीसरी चुनौती विकास की क्षमता को विस्तार देने की है। आज भारत आठ प्रतिशत विकास दर को संभाल सकता है, लेकिन इसे नौ व दस प्रतिशत पर ले जाने के लिए उसे पूंजीगत संसाधनों की जरूरत पड़ेगी। इसके लिए पूंजी बाजार को अधिक समर्थ बनाना होगा, सार्वजनिक व पीपीपी के जरिये इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में अधिकाधिक निवेश सुनिश्चित करना होगा।

चौथी चुनौती बड़ी संख्या में रोजगार के अवसर जुटाने और कुशल कामगार तैयार करने की है। ऐसा माना जाता है कि भारत की आर्थिक विकास दर पर्याप्त संख्या में रोजगार के अवसर नहीं जुटा पा रही है। दूसरी तरफ कई क्षेत्रों में कुशल कामगारों की कमी महसूस की जा रही है। इन दोनों समस्याओं को दूर करने के लिए हमें अपनी शिक्षा व प्रशिक्षण प्रणाली को दुरुस्त करना होगा और छोटे व लघु उद्योगों को बढ़ावा देना होगा।

पांचवी प्रौद्योगिकी के विस्तार की है। उच्च उत्पादकता व प्रतिस्पर्धा के लिहाज से प्रौद्योगिकी का बड़ा योगदान है। अत: इस दिशा में ध्यान देने की आवश्यकता है। इसी तरह, छठी चुनौती पर्यावरण संरक्षण की है। इसके लिए हमें ऊर्जा क्षेत्र में इको-फ्रेंडली प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने के अलावा जल प्रबंधन, आवास निर्माण व परिवहन के मोरचे पर ध्यान देना होगा।

सातवीं चुनौती राज्यों को संसाधनों के हस्तांतरण के लिए वैकल्पिक तंत्र तलाशने की है। मौजूदा व्यवस्था असंतुलन दूर करने में नाकामयाब रही है। आठवीं महत्वपूर्ण चुनौती पिछड़े क्षेत्रों के विकास की है। हालांकि देश ने विभिन्न क्षेत्रों में तेजी से तरक्की की है, लेकिन यह भी सच है कि हमारी आबादी का एक बड़ा हिस्सा इस तरक्की से अछूता है। इनके पिछड़ेपन की कई वजहें हैं, लेकिन मुख्य कारण सड़क, संचार, सिंचाई, स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी आधारभूत सुविधाओं की कमी ही है।

यदि हम ढर्रे पर काम करते रहे, तो इन लक्ष्यों को हासिल नहीं कर पाएंगे। इसीलिए योजना आयोग ने कई विवादास्पद मुद्दों को सार्वजनिक बहस के लिए प्रस्तुत करके अच्छा ही किया है। आखिर बहसें फैसले के किसी बिंदु पर तो पहुंचेंगी ही। भविष्य के विकास की रेखाओं का पुनर्निधारण जरूरी है, ताकि 12वी पंचवर्षीय योजना एक और योजना भर न रह जाए।

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