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मंदी के दौर में बिन लादेन का मारा जाना

ओसामा बिन लादेन की मौत का विश्व अर्थव्यवस्था से कोई रिश्ता हो या न हो, इसका अर्थव्यवस्था पर असर जरूर पड़ेगा। ओसामा का अंत ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका सहित विश्व भर की अर्थव्यवस्थाएं मंदी से निकलने की कोशिश कर रही हैं।

वैसे वारेन बफेट जैसे कारोबारी नहीं मानते कि बिन लादेन की मृत्यु का अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव होगा। वह कहते हैं कि ओसामा के जाने के बावजूद आतंकवाद से संबंधित खर्च जारी रहेगा। हालांकि वह ये भी कहते हैं कि उसकी मृत्यु और अमेरिका के बजट घाटे में संबंध है। ओसामा के बाद यदि अल कायदा का संगठन कमजोर हुआ और सुरक्षा जोखिम कम हुआ, तो रक्षा संबंधी व इंश्योरेंस जैसे सामाजिक सुरक्षा व्यय में कमी होगी।

आतंकवाद विरोधी युद्ध में अमेरिका करीब 11 खरब 90 करोड़ डॉलर खर्च कर चुका है और प्रति मिनट यह खर्च बढ़ रहा है। खर्च में यह कमी अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए ऑक्सीजन साबित हो सकती  है। जुलाई 2011 से ओबामा ने अफगानिस्तान से फौज की संख्या में कटौती करने की घोषणा कर रखी है। ओसामा के अंत के बाद ऐसा करना उनके लिए आसान हो गया है। इसका असर अर्थव्यवस्था पर पड़ना निश्चित है।

दूसरी राय यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का संकट लादेन की वजह से शुरू नहीं हुआ था। इसका कारण वहां के कर्ज व्यवसाय के बुलबुले का फूट जाना था। इसलिए इस तर्क का कोई अर्थ नहीं कि लादेन के जाने बाद इस पर कोई दीर्घकालिक असर पड़ेगा। कुछ क्षणिक असर जरूर दिख सकते हैं। हालांकि इसका दूसरा पक्ष भी है। 

आतंक से जंग पर फोकस करने के कारण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण क्षेत्रों से ध्यान ही नहीं बंटा, प्राथमिकताएं भी बदलीं, जंग से जुड़ी चीजों पर खर्च बढ़ा। युद्ध लंबा खिंचने का असर निवेशकों के आत्मविश्वास पर पड़ा, जो शेयर बाजार में दिखाई भी पड़ा। इसलिए यह माना जा रहा है कि ऐसे खर्च कम होने से शेयर बाजारों में उत्साह फिर से लौट सकता है।

कच्चे तेल के मूल्य पर इसके असर का भी अध्ययन किया जा रहा है। अल कायदा लगातार अर्थव्यवस्था को बरबाद करने की धमकी देता रहा। उसने तेल पाइप लाइनों एवं तेलशोधक कारखानों को भी निशाना बनाया। यमन में तेल उत्पादन को अल कायदा हमले ने प्रभावित किया। सऊदी अरब के तेल संस्थानों पर कई बार हमला हुआ, जिसमें दुनिया के सबसे बड़े तेल प्रसंस्करण केंद्र अब्कूक कॉम्प्लेक्स पर 2006 में ट्रक बम से हमला प्रमुख है।

ओसामा के मारे जाने की खबर के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल मूल्यों में अचानक एक डॉलर प्रति बैरल की गिरावट आ गई। तेल मूल्यों पर इस बात का असर पड़ेगा कि आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया में हवा का रुख किधर रहता है। अगर वहां अशांति पैदा हुई, तो कीमतें बढ़ भी सकती हैं।

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