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खतरे में बातचीत

इस्लामाबाद के बाहर एबटाबाद में एक अहाते में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद दक्षिण एशिया में सिर उठाता बड़ा प्रश्न यह है कि इसका भारत-पाकिस्तान के बीच शांति वार्ता के लिए हाल ही में उठाए कदमों पर क्या असर पड़ेगा? यहां कुछ निराशाजनक आशंकाएं हैं। पाकिस्तान में आतंकवादियों का केंद्र होने संबंधी बयानों के पुख्ता होने के बाद इस प्रक्रिया में राजनीतिक और व्यावहारिक तौर पर भारतीय अधिकारियों के लिए यह संभवत: जहर घोलने का काम करेगा।

भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में पाकिस्तान के साथ शांति वार्ता के प्रयासों को प्रमुखता दी थी, लेकिन इस मामले का सूक्ष्म परीक्षण करने वाले पूछ सकते हैं कि अगर बिन लादेन अच्छी-खासी जनसंख्या वाले पाकिस्तानी शहर में रह रहा था, वो भी आसपास बने घरों से कहीं बड़ी हवेली में, तब इस्लामाबाद से लश्कर-ए-तैयबा और अन्य आतंकवादी संगठनों पर कठोर कार्रवाई की बात कहने की उम्मीद छोड़ ही देनी चाहिए।

भारत आतंकवादियों को सजा पाते देखना चाहता है। टीका-टिप्पणी करने वाले यह भी पूछ सकते हैं कि अगर अमेरिका पाकिस्तान पर इतना भरोसा नहीं करता कि बिन लादेन के अहाते पर धावा बोलने से पहले उसे सचेत कर दे, जैसी कि कहानियां वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी सुना रहे हैं, तो फिर भारत के कूटनीतिज्ञ और सैन्य अधिकारी शांति वार्ता के लिए अपने पाकिस्तानी समकक्षों पर कैसे भरोसा कर सकते हैं?                  

 

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