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लिलीपुट होने की खुशी

अभी थोड़ी देर पहले ही खबर आई थी। उनके साथी ने चहककर सुनाई थी। किसी को बाहर कर दिया गया था। उनका चेहरा खुशी से खिल उठा था। अगर हम कुढ़ नहीं रहे हैं, तो दूसरों की परेशानी पर खुश नहीं हो सकते। डॉ. नाद्जा जीपर्ट मानती हैं कि यह मजेदार चीज है। उसमें हम खुद जहर लेते हैं और चाहते हैं दूसरा मर जाए। इसे कुछ भी कह लो। यह असल खुशी नहीं है। लॉस एंजलिस के सीडार्स सिनाई हॉस्पीटल के क्रिटिकल इन्सीडेंट स्ट्रेस मैनेजमेंट टीम से जुड़ी हुई हैं नाद्जा। स्ट्रेस पर उनकी किताब ‘आई ऑफ द स्टॉर्म’ को पढ़कर देखना चाहिए।

आखिर जिंदगी में हंसी से बेहतर क्या है? वह हंसी आखिर खुशी के बिना नहीं आ सकती। लेकिन कुछ ऐसी हंसी-खुशी भी होती हैं, जो दूसरों के दुख-दर्द को देखकर आती हैं। यह जलन और ईर्ष्या की खुशी है। यह हमारे अचानक लिलीपुट हो जाने की खुशी है। कुढ़न या जलन हमें कभी बड़ा नहीं बनाती। हम जब भी बड़े होते हैं, तो किसी के गिरने पर खुश नहीं होते। हम अपनी कामयाबी का जश्न मनाते हैं। लेकिन दूसरे की नाकामयाबी पर खुश नहीं होते।

लोग कहते हैं कि जलन और ईर्ष्या तो हमारे स्वभाव में होती है? लेकिन नाद्जा उसे नहीं मानतीं। वह पूछती हैं कि क्या आपने कभी किसी की तकलीफ में खुश होने वाले को फख्र करते देखा है? शायद नहीं। उस खुशी को हासिल करने वाले में भी फख्र का भाव क्यों नहीं आता? इसलिए कि कोई छोटे होने का सपना नहीं देखता। यानी जलन और कुढ़न हम खुद लाद लेते हैं। यही वजह है कि इन निगेटिव चीजों को हम अपने से दूर कर सकते हैं। अब जिन चीजों को हम लाद सकते हैं, आखिर उन्हें उतार भी तो सकते हैं। एक गलतफहमी हमें असल खुशी नहीं दे सकती। वह हमें नीचे और नीचे की ओर ले जाती है। क्या हम नीचे जाना चाहते हैं? 

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