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सहायता पर सवाल

पाकिस्तान के लिए यह बताना मुश्किल हो रहा है कि ओसामा बिन लादेन के एबटाबाद में रहने और अमेरिकियों के हाथों उसके मारे जाने में उसकी क्या भूमिका थी। यह स्वीकार करने के लिए लोग तैयार नहीं हैं कि ओसामा को पाकिस्तानी सत्ता तंत्र का संरक्षण नहीं मिला हुआ था।

यह कोई छिपी हुई बात नहीं है कि पाकिस्तान की आतंकवादी संगठनों से मिलीभगत है और आतंकवाद विरोधी युद्ध में वह आधे-अधूरे मन से ही शामिल है, लेकिन ओसामा प्रकरण ने इस बात का इतना स्पष्ट प्रमाण दे दिया है कि पाकिस्तान से सहानुभूति रखने वाले लोगों के लिए भी सफाई देना मुश्किल पड़ रहा है। अमेरिकी प्रशासन को ओसामा के मारे जाने पर वाहवाही तो मिल रही है, लेकिन उसे पाकिस्तान को लगातार सहायता देने को सही ठहराना भी मुश्किल पड़ रहा है।

अमेरिका में मजबूत तर्क यह प्रस्तुत किया जा रहा है कि जिसे अमेरिकी अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते थे, उसे पाकिस्तान में संरक्षण मिला हुआ था, तो पाकिस्तान को सहायता क्यों दी जाए। अमेरिकी प्रशासन आतंकवाद विरोधी युद्ध में पाकिस्तान की भागीदारी के लिए इस वर्ष उसे तीन अरब डॉलर की सहायता देने वाला है, लेकिन एक रिपब्लिकन सांसद टेड पो ने एक बिल पेश किया है, जिसमें यह कहा गया है कि जब तक यह साबित न हो जाए कि लादेन के एबटाबाद में छिपे होने में पाकिस्तानी सत्ता तंत्र की कोई भूमिका नहीं थी, तब तक पाकिस्तान को अमेरिकी सहायता रोक दी जाए।

कुछ और सांसदों ने भी मांग की है कि पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता पर तुरंत रोक लगाई जाए। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भी अगले हफ्ते पाकिस्तान में होने वाली बातचीत सुरक्षा कारणों के हवाले से स्थगित कर दी है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान को मिल रही सहायता पर पहली बार अमेरिकी सांसदों ने ऐतराज जताया है। यह मुद्दा पहले भी कई बार उठा है। लेकिन ओसामा बिन लादेन का मामला भावनात्मक उत्तेजना लिए हुए है और इस वक्त सहायता के मुद्दे को ठंडा करना सरकार के लिए आसान नहीं होगा।

पाकिस्तान का संकीर्ण हित इसमें है कि आतंकवादी संगठन खत्म न हों। आतंकवाद उसकी विदेश नीति का प्रमुख औजार है और उसे मालूम है कि जब तक आतंकवाद रहेगा, वह अमेरिका से वसूली करता रह सकेगा। अगर आतंकवाद खत्म हो जाता है और अमेरिकी अफगानिस्तान से लौट जाते हैं, तो पाकिस्तान का महत्व लगभग शून्य हो जाएगा।

यह बात अमेरिकी भी समझते हैं, लेकिन उनकी मजबूरी है कि वे पाकिस्तान के बिना आगे नहीं बढ़ सकते। इसीलिए पाकिस्तान को सहायता देना भी उनकी मजबूरी है। जब पाकिस्तान को सहायता रोकने की बात होती है, तो उसका डर दिखाकर वे पाकिस्तान से आतंकवाद के खिलाफ कुछ कार्रवाई करवा लेते हैं। 

इसीलिए अमेरिकी विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने यह साफ कर दिया कि पाकिस्तान के साथ सहयोग जारी रहेगा। लेकिन अगर यह साफ तौर पर साबित हो जाता है कि ओसामा पाकिस्तानी तंत्र की मिलीभगत से एबटाबाद में रह रहा था, तो अमेरिकी सरकार के लिए पाकिस्तान के साथ सहयोग की नीति का समर्थन करना मुश्किल हो जाएगा। 

पाकिस्तानी-अमेरिकी सहयोग ऐसा दिखावा है, जिसे चलाना दोनों के लिए जरूरी है, वरना आईएसआई आतंकवाद समर्थक संगठनों की अमेरिकी सूची में नहीं होती। अब यह दिखावा करना मुश्किल होता जा रहा है। फिलहाल पाकिस्तान सरकार लीपापोती में लगी है, लेकिन अब अमेरिकी सरकार के लिए पाकिस्तान के प्रति आर्थिक उदारता का तर्क ढूंढ़ना मुश्किल होता जाएगा। अमेरिकी सांसदों का रवैया तो यही बताता है।

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