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मौका देने वाला शहर है दिल्ली

मौका देने वाला शहर है दिल्ली

संगीता गुप्ता यूं तो भारतीय राजस्व सेवा की वरिष्ठ पदाधिकारी हैं लेकिन कला जगत में उनकी खास पहचान है। राष्ट्रीय/अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी कलाकृतियों की अनेक प्रदर्शनियां आयोजित हो चुकी हैं। लगभग डेढ़ दशक से दिल्ली में रह रही संगीता को दिल्ली में अनेक खूबियां नजर आती हैं। सत्य सिंधु ने उनसे बात की, पेश है मुख्य अंश-

दिल्ली आपको कैसी लगती है?

दिल्ली बहुत अच्छी लगती है। कभी घूमने-फिरने आती थी तो भी अच्छी लगती थी। मौके देने वाला शहर है यह। मैं तो आईआरएस की अधिकारी हूं। यहां आकर मेरे करियर में लाभ हुआ, अच्छे-अच्छे मौके मिले क्योंकि मंत्रालय से लेकर तमाम बड़े कार्यालय भी यहीं हैं। किसी छोटी जगह होती तो काम करने के इतने मौके नहीं मिल पाते जितने दिल्ली में आकर मिले। इसके अलावा आर्ट के क्षेत्र में भी काम करने के अच्छे मौके मिले। यहां सरकारी के साथ-साथ अनेक बड़ी-बड़ी निजी गैलरियां हैं और कला प्रेमियों की भी कमी नहीं है। मैं यहां खूब पेंटिंग भी कर पाई हूं और कई किताबें लिख पाई हूं।

दिल्ली से आपका रिश्ता कब व कैसे जुड़ा?

रहने के लिए मैं 1997 में यहां आई जब कोलकाता से यहां मेरा तबादला हुआ। उसके बाद दिल्ली से पहचान शुरू हुई, यहां के दफ्तरों से लेकर आर्ट गैलरियों और सांस्कृतिक केन्द्रों तक से पहचान हुई। आज तो दिल्ली अपनी हो गई है।

10 साल पहले की और आज की दिल्ली में क्या-क्या बदलाव महसूस करती हैं?

दिलवालों की दिल्ली इन वर्षों में काफी खूबसूरत हो गई है। ढांचागत सुविधाएं बढ़ गई हैं। दिल्ली वालों को दिल्ली मेट्रो मिल गई। हालांकि मैं मेट्रो का कोई लाभ नहीं उठा पाती लेकिन इस सच को इंकार नहीं कर सकते कि इसकी वजह से ट्रैफिक व्यवस्था में काफी सुधार हुआ है। अनेक फ्लाई ऑवर्स बन गए हैं जिससे हमारा समय मच जाता है।

तब का सांस्कृतिक माहौल कैसा होता था और आज कैसा पाती हैं?

सांस्कृतिक गतिविधियां तो तब भी अच्छी थी और आज भी अच्छी है। कार्यक्रम तब भी काफी अच्छे होते थे, आज भी काफी अच्छे होते हैं। आज गतिविधियां काफी बढ़ गई हैं जिससे मुझे काफी खुशी मिलती है। चार-पांच निमंत्रण हर रोज होते हैं लेकिन जाना संभव नहीं हो पाता है।

दिल्ली की कौन-कौन सी बातें आपको बहुत पसंद है?

यहां की हरियाली, ऐतिहासिक इमारतें और अच्छी सड़कें भी मुझे खूब पसंद आती हैं। और दिल्ली के खाने के क्या कहने। वह तो लाजवाब है ही। खासकर ओल्ड दिल्ली का खाना बहुत अच्छा लगता है। चाहे गली पराठे वाली के पराठे हों या निजामुद्दीन में करीम चाचा के कबाब आदि। इनका जवाब नहीं।

यहां की कौन-सी बातें पसंद नहीं हैं?

कोलकाता की तुलना में यहां के लोग ज्यादा सेल्फ सेंटर्ड हैं, वे एग्रेसिव हैं। मतलब के रिश्ते बनाने वाले लोग भी तेजी से बढ़ रहे हैं जो मन को दुखी करते हैं।

यहां किन-किन जगहों को आप मिस करती हैं और सोचती हैं कि काश समय मिले तो वहां जाएं, कुछ वक्त बिताएं?

आर्ट के फंक्शन में जाना पसंद है। इंडिया हैबिटेट सेंटर, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर और मंडी हाउस में काफी सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं जिन्हें मिस करती हूं।

आपकी पूरी दिनचर्या क्या होती है?

सोमवार से शुक्रवार तक तो नौकरी करती हूं। इन दिनों में शाम में थोड़ा समय मिल जाए तो किसी इवेंट में चली जाती हूं। शनिवार और रविवार को पेंटिंग करती हूं। इन दोनों दिन तो मैं घर से बाहर निकलने से भी परहेज करती हूं क्योंकि ये दोनों दिन रचनात्मक काम के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण होते हैं।

घर का कौन-सा कोना सबसे ज्यादा पसंद है और क्यों?

अपना कमरा और स्टुडियो बहुत पसंद है। खासकर स्टुडियो में मैं बहुत समय बिताना पसंद करती हूं क्योंकि वहां काम करते हुए काफी सुकून महसूस करती हूं। शनिवार और रविवार को घर में रहकर काफी काम कर पाती हूं। अधिक से अधिक समय स्टुडियो मे बिताना पसंद करती हूं क्योंकि उससे सुख भी मिलता है और संतुष्टि भी। समय मिल जाए तो कुछ लिखना, पढ़ना भी हो जाता है। लिखना आजकल थोड़ा कम हो गया है लेकिन अभी बहुत कुछ लिखना है।

आपके लिए सफलता क्या है?

आमतौर पर पैसा और पावर को सफलता का पैमाना माना जाता है लेकिन मैं सफलता को कभी भी इन चीजों से नहीं जोड़ती। मेरे लिए अपने ढ़ंग से अच्छी जिंदगी जीना ही जीवन की सफलता है। मैं अपने ढंग अपनी जिंदगी जी पा रही हूं यहीं मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है। भौतिक तरक्की से सफलता को जोड़ना मुझे उचित नहीं लगता।

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